शनिवार, 13 जून 2026

*१९. लै का अंग ~५/७*

*🙏🇮🇳 #daduji 🇮🇳🙏*
*🌷卐 सत्यराम सा 卐🌷*
*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*१९. लै का अंग ~५/७*
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*जन रज्जब या लोक में, ल्यौ निस्तारण हार ।*
*आदि अंत मधि मुनि मही, लघु दीरध लौ लार ॥५॥*
इस लोक में ब्रह्म में वृत्ति लगाना रूप साधन ही संसार से पार करने वाला है । इस भूमंडल से सृष्टि के आदिकाल, मध्यकाल और अंत समय तक जो भी मुनि हुये है, वे ब्रह्म में वृत्ति लगाना रूप साधन से ही लघु से महान हुये हैं ।
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*रज्जब लायक ठौर ल्यौ, ल्यौ में रहे सु लाज ।*
*लघु दीरघ ह्वै लाग ल्यौ, ल्यौ करणी शिरताज ॥६॥*
ब्रह्म में वृत्ति लगाना रूप साधन निर्विकल्प स्थिति रूप उचित स्थान में स्थित करता है तथा इस साधन से ब्रह्म प्राप्ति द्वारा संसार में साधक की लज्जा रह जाती है, ब्रह्म में वृत्ति लगाकर लघु भी महान हो जाते हैं, मानव के लिये ब्रह्म में वृत्ति लगाना रूप कर्तव्य शिरोमणि है ।
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*ल्यौ मारग लूटैं नहीं, लोभी लूटण हार ।*
*रज्जब पग लागे चलहिं, परपंची सरदार ॥७॥*
परमानन्द को लूटने की आशा वाले, ब्रह्म में वृत्ति लगाकर तो नहीं लूटते
किन्तु उसे लूटने के लिये संसार प्रपंच में फंसे हुये श्रीमान् सरदारों के पैरों में लगे चलते हैं अर्थात उनकी गुलामी करते हैं और दु:ख ही पाते हैं ।
(क्रमशः) 

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