मंगलवार, 7 जुलाई 2026

*२०. सुमिरण का अंग ~८५/८८*

*🙏🇮🇳 #daduji 🇮🇳🙏*
*🌷卐 सत्यराम सा 卐🌷*
*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*२०. सुमिरण का अंग ~८५/८८*
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*वोहित बिन क्यों समुद्र लंघिये, औषध बिन क्यों रोग ।*
*त्यों रज्जब निज नाम बिहुना१, कदे न निपजे योग ॥८५॥*
जहाज के बिना समुद्र नहीं लांघा जाता, औषधि सेवन बिना रोग नष्ट नहीं होता, वैसे ही निज नाम(नाम तीन प्रकार के होते हैं - १- गुणज जैसे दयालु, २- कर्मज जैसे - मधुसूदन, ३- निज - गुण, कर्म के बिना ही जो स्वरूप भूत हो जैसे - ॐ, राम ब्रह्म, सत्य आदि) के स्मरण बिना योग कभी भी सिद्ध नहीं होता । योग के नाम स्मरण की मुख्यता रहती है ।
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*ब्रह्म वृक्ष के सहस जड़, सब ही औषधि आदि ।*
*रज्जब रोग कहाँ रहे, खाय रू दीज्यो दादि१ ॥८६॥*
ब्रह्म रूप वृक्ष के नाम रूप हजारों जड़ हैं और सभी जन्मादि संसार रोग को नष्ट करने के लिये आदि काल से ही औषधी रूप हैं, उनका स्मरण रूप भक्षण करने से जन्मादि रोग कहाँ रह सकता है ? अत: हे साधको ! उनमें से किसी का भी स्मरण रूप का भक्षण करके उससे होने वाले लाभ के विषय में उसकी अवश्य प्रशंसा१ करना ।
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*देख्या दह दिशि नाँहिं माग, रज्जब उलटा उनमन लाग ।*
*सुमिरन साँच उतर वा१ पार, नौ लख कांवरू एक ही द्वार ॥८७॥*
संतों ने विचार करके सभी ओर देखा है, यर्थात रूप से ब्रह्म चिन्तन किये बिना ब्रह्म प्राप्ति का कोई मार्ग नहीं है । जैसे नौ लाख कावड़ों का जल एकही द्वार से रामेश्वर के चढ़ता है, वैसे ही यर्थात स्मरण द्वारा ही संसार-सिन्धु के उस१ पार जाकर ब्रह्म को प्राप्त किया जाता है ।
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*समझ सुहागा रूप, साँच सहित सुमिरन करै ।*
*रज्जब युक्ति अनूप, जिहिं कंचन करता गरै ॥८८॥*
सुहागा डालकर अग्नि लगाने से सुर्वण गल जाता है, वैसे ही विचार के सहित यथार्थ रूप से राम नाम स्मरण करना अनुपम युक्ति है, जिस युक्ति के द्वारा सृष्टिकर्ता ईश्वर भी द्रवित हो जाते हैं, अर्थात प्रसन्न हो जाते हैं ।
(क्रमशः)

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