बुधवार, 22 जुलाई 2026

भजनानन्दी

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷*卐 श्री दादूदयालवे नम: 卐*🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
*शब्दों मांहिं राम-रस, साधों भर दीया ।*
*आदि अंत सब संत मिलि, यों दादू पीया ॥*
.
८. वें महन्त परशुरामजी अच्छे भजनानन्दी हुये हैं । ९. वें रामनारायणजी गायक व वैद्य हैं ।
१८ बालकदासजी = बालकदासजी हेमदासजी के ही एक अन्य शिष्य थे । इनका एक लघु ग्रन्थ "गुरु महिमा" है । उसमें प्रथम एक दोहा है, शेष १३ छप्पय, इन्दव, मनहर है । यह १४ पद्यों में है । इसमें दादू जी २- गरीबदासजी ३- केवलरामजी ४- रामदासजी ५- हरिभक्तजी ६- हरिदासजी ७- लालदासजी और अपने गुरु ८- हेमदासजी ।
.
इन आठ संतों की महिमा कही है- उदाहरण~ सवैया~
दास गरीब के पाट विराजत,
केवलरामजी केवल ध्यावें ।
केवल लै रु समाधि हु केवल,
केवल ध्यान रु केवल भावें ॥
केवल ज्ञान गिरा पुनि केवल,
केवल ब्रह्महि विश्व दिखावें ।
बालकदास कहै निज केवल,
केवल है अरु केवल गावें ॥७॥
.
मनहर~
केवल राम के पाट सुख से विराजे सो तो,
रामजी के प्यारे रामदास जी कहाये हैं ।
नैना राम वैनाराम आशैराम इष्ट राम,
राम ही उपासना सु मत ठहाराये हैं ॥
एक समै द्वारिका में सैल सु करत जाय,
राखे रणछोड़ रहो वचन सुनाये हैं ।
वैना करवाये गुण गावे एक राम ही के,
कहत बालकदास राम मन भाये हैं ॥८॥
उक्त कवित्त के अन्तिम दो पादों से ज्ञात है कि~ रामदासजी भ्रमण करते हुये द्वारकापुरी में गये तब भगवान् कृष्ण ने यह कह कर कि यहां भी कुछ दिन रहो, द्वारिका में रामदास जी को रोका था और उनसे वैना अर्थात् व्याख्यान करवाते थे, तब रामदासजी एक राम ही के गुण गाते थे । क्योंकि उनके मन को एक राम ही प्रिय लगते थे ।
.
बालकदास जी की ज्ञान, भक्ति, वैराग्यादि संबन्धी अन्य रचनायें भी मिलती हैं और अच्छी भी हैं किन्तु कितनी हैं, यह निर्णय नहीं हो सका है । इनकी रचना को देखते हुये ये अच्छे कवि ज्ञात होते हैं । अतः इनकी रचनायें अधिक ही होनी चाहियें । अन्य रचना का उदाहरण~ मनहर~
"कुंजन के बाल सो तो हिम से हरत राखे,
टीटोड़ी के बाल राखे भारत विशाल से ।
बालक प्रह्लाद हु की शासना अनेक टारी,
मंजारी के बाल राखे पावक की झाल से ॥
बालखिल्यादिक प्रभु तुम ने उधारे आय,
कुन्ति हु के पंच बाल राखे हैं दयाल तैं ।
कहत बालकदास बालक दयालु तेरा,
आय कर बालक को क्यों न राखें काल तैं ॥"
बालकदासजी वि. सं. १८५९ में ब्रह्मलीन हुये थे । इनकी समाधि लालदासजी की समाधि के पास गवा की पहाड़ी पर है । वहां अन्य भी बहुत से दादूपंथी संतों के चरण चिन्ह हैं ।
(क्रमशः)

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें