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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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३१. अन्योन्य भेद कौ अंग १/४
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१ज्ञान की विभिन्न पद्धतियों का निरूपण –
सुन्दर ज्ञानी नृपति कै, सेना है चतुरंग ।
रथ अश्व गज त्रय अवस्था, इन्द्रिय पाइक संग ॥१॥
१राजा की समता से ज्ञानी की प्रशंसा : महाराज श्रीसुन्दरदासजी कहते हैं - जैसे लोक में किसी राजा के पास चतुरङ्गिणी(रथ, अश्व, गज एवं पैदल - इन चार अङ्गों वाली) सेना में १. रथ, २. घोड़े, ३. हाथी एवं पैदल सेना होती है; उसी प्रकार ज्ञानी साधक के पास भी चार अङ्गों वाली सेना होती है । ज्ञानी की सेना में उसका १. श्रवण ही रथसेना है, २. मनन अश्वसेना है तथा ३. निदिध्यासन अवस्था उसकी गजसेना है एवं ४. उसकी इन्द्रियाँ ही उस की पैदल सेना(पाइक) है ॥१॥
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तुरिया सिंघासन कियौ, तुरियातीत सु वोक ।
ज्ञान छत्र है सीस पर, सुन्दर हर्ष न शोक ॥२॥
उस ज्ञानी की तुर्य(चतुर्थ) अवस्था उसका सिंहासन है तथा उसकी तुर्यातीत अवस्था उसका ओक(वास स्थान = राजप्रासाद, महल) है । ज्ञानी का ज्ञान उसका छत्र है । इन सबल साधनों के कारण वह ज्ञानी भी एक बलवान् राजा के समान ही अपने ज्ञानसाम्राज्य पर निष्कण्टक(निर्विघ्न) शासन करता है ॥२॥
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रथ चौवीस हु तत्व कौ, कर्म सुभासुभ बैल ।
सुन्दर ज्ञानी सारथी१, करै दशौं दिशि सैल ॥३॥
शास्त्रोक्त २४ तत्त्व ही उसकी लौकिक जीवनयात्रा का साधन रथ है । उस के शुभाशुभ कर्म ही उस रथ में जुते हुए बैल हैं । श्रीसुन्दरदासजी कहते हैं - स्वयं वह ज्ञानी ही उस रथ का सारथि(सञ्चालक) है१ । इस प्रकार वह दशों दिशाओं की अपनी यात्रा(सैल) विना किसी विघ्न बाधा के पूर्ण करता है ॥३॥ (१ आत्मानं रथिनं विद्धि, शरीरं रथमेव च । - उपनिषद्)
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तीनौं गुन इंद्रिय सकल, ये सब चालै गैल ।
सुन्दर बिचरत जगत मंहिं, ताहि न लागै मैल ॥४॥
सत्त्व, रज एवं तम - ये तीन गुण एवं उस की दशों इन्द्रियाँ ही उसके अनुचर(पीछे चलने वाले सहायक) हैं । इस प्रकार वह ज्ञानी इन साधनों से अपनी जीवनयात्रा निर्विकार भाव से पूर्ण करता रहता है ॥४॥ (१)
(क्रमशः)

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