शनिवार, 8 अगस्त 2026

*२२. अजपा जाप का अंग ~२१/२५*

*🙏🇮🇳 #daduji 🇮🇳🙏*
*🌷卐 सत्यराम सा 卐🌷*
*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*२२. अजपा जाप का अंग ~२१/२५*
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*सुरता सुई समान है, रज्जब वैद्य विवेक ।*
*अम्बलबेत आराध में, उभय वस्तु ह्वै एक ॥२१॥*
जैसे वैद्य सुई को अम्बलबेत नींबू में रख देता है तब वह गल कर अम्बलबेत रूप ही हो जाती है, वैसे ही विवेक युक्त साधक वृत्ति को अजपा जाप रूप उपासना में रखता है तब वही भी ब्रह्म रूप ही हो जाता है इस प्रकार नींबू और सुई तथा जीव और ब्रह्म दोनों वस्तु एक हो जाती हैं ।
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*सुमिरण शून्य समान है, आतम अभ्र अनेक ।*
*रज्जब वायु विचार मिल, बाट बटाऊ एक ॥२२॥*
जैसे आकाश में अनेक बादल दिखाई देते हैं, वे सभी वायु द्वारा एक मार्ग से चलकर आकाश में ही लय हो जाते हैं, वैसे ही स्मरण में संलग्न अनेक साधक आत्माएँ पथिक भी विचार द्वारा एक अजपा जाप मार्ग से ब्रह्म में ही लय होते हैं ।
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*नाम लिहारी१ नापिगा२, नदी नाथ३ निज नांउ ।*
*पंथ पथिक मिल एक ह्वै, यहु अजपा बलि जांउ ॥२३॥*
जैसे सभी नदियां२ विभिन्न मार्गों से चलकर समुद्र३ में जाते ही, वे मार्ग और जल सभी समुद्र में मिलकर एक हो जाते हैं, वैसे ही निज नाम का स्मरण करने वाले१ सभी साधक और साधन अजपा जाप की परिपाकावस्था में जाते ही सब ब्रह्म में मिलकर अद्वैत ब्रह्म रूप ही हो जाते हैं, यह एक हो जाना ही अजपा जाप है, हम इस अवस्था की बलिहारी जाते हैं ।
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*जिस नुकते१ साहिब स्रव२हिं, सही३ सु अजपा जाप ।*
*रज्जब पावे प्राण सो, जा जीवहिं दे आप ॥२४॥*
जिस सूक्ष्म साधन१ से भगवान दया२ करते हैं, वही सच्चा३ अजपा जाप है । यह अजपा जाप साधन, जिस जीव को स्वयं भगवान देते हैं, उसी प्राणी को प्राप्त होता है ।
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*प्रेम प्रीति हित नेह सु यारी, राम मुहब्बत सुरति सँभारी ।*
*रज्जब रत रुचि धुन सु आगे, द्वादश कला लगन को लागे ॥२५॥*
१.प्रेम, २.प्रीति, ३.हित, ४.स्नेह, ५.यारी, ६.राग, ७.मुहब्बत, ८.सुरति, ९.सँभारना, १०.रत होना, ११.रुचि, १२.धुन, ये जो प्रेम की द्वादश कला है, इन से आगे अजपा जाप में कोई विरले साधक की ही लगन लगती है अर्थात अद्वैत् स्थिति को विरला ही प्राप्त होता है ।
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इति श्री रज्जब गिरार्थ प्रकाशिका सहित “२२. अजपा जाप का अंग” समाप्त ॥
(क्रमशः)

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