*🙏🇮🇳 #daduji 🇮🇳🙏*
*🌷卐 सत्यराम सा 卐🌷*
*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*२३. ध्यान का अंग ~१/४*
इस अंग में ध्यान सम्बन्धी विचार कर रहे हैं -
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*विभूति१ भूत२ भगवंत लग, होहं३ सोहं४ ध्यान ।*
*यथा धूम पावक सहित, रज्जब शून्य समान ॥१॥*
माया१ प्राणी२ और भगवान यह भेद भासता है जब तक ही मैं है३, वह मैं हूँ४ ऐसा ध्यान रहता है, फिर साधन की परिपाकावस्था ज्ञान में तो जैसे काष्ठ को जला कर धूआँ और अग्नि दोनों ही लय हो जाते हैं, वैसे ही ध्यान, ध्याता, ध्येय रूप त्रिपुटी ब्रह्म में लय हो जाती है, उस स्थिति में अद्वैत ही भासता है ।
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*ध्यान रूधिर खीरो भयो, ध्यान सु लोही काम ।*
*तैसे रज्जब ध्यान में, प्राणि पलट ह्वै राम ॥२॥*
जैसे रक्त से दूध और लोही से वीर्य बनता है, वैसे ही ध्यान में स्थित होने से प्राणी बदल कर राम स्वरूप ही हो जाता है ।
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*रज्जब एक हि ध्यान में, नर नारायण होय ।*
*मनसा वाचा कर्मना, कीट भृंग ले जोय ॥३॥*
हम मन वचन कर्म से कहते हैं कि - एक मात्र नारायण के ध्यान में वृत्ति स्थित रहने से नर नारायण बन जाता है, इसका उदाहरण लोक में भी प्रत्यक्ष है देख लो, कीट भृंग का ध्यान करता है तब भृंग ही बन जाता है ।
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*परम पुरुष का ध्यान धर, जैसे चन्द्र चकोर ।*
*जन रज्जब चारों पहर, मेली पलक न कोर ॥४॥*
जैसे चकोर पक्षी रात्रि में चारों पहरों में अपने नेत्रों की पलक के किनारे न मिलाकर चन्द्रमा का ध्यान करता है, वैसे ही परम पुरुष परमात्मा का ध्यान करना चाहिये ।
(क्रमशः)

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