रविवार, 16 अगस्त 2026

३१. अन्योन्य भेद कौ अंग ३७/३९

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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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३१. अन्योन्य भेद कौ अंग ३७/३९
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बचन जाल उरझै सबै, सुरझावैं गुरु देव । 
नेति नेति करते रहैं, सुन्दर अलख अभेव ॥३७॥
इसी वाग्जाल में समस्त संसार आबद्ध है । अब तो कोई सद्‌गुरु ही अपने अमृतमय ज्ञानोपदेश के द्वारा इस भ्रमजाल को सुलझा सकते हैं । अन्यथा अन्य सभी तथाकथित गुरु उस अलक्ष्य एवं अभेद्य तत्त्व को 'नेति नेति' कह कर अपना पल्ला झाड़ चुके तथा अपने उत्तरदायित्व से मुक्त हो चुके हैं ! ॥३७॥
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एक अखंडित ब्रह्म है, दूसर नांही आंन । 
सुन्दर भ्रम रजनी मिटै, प्रगट होइ जब भांन ॥३८॥
उपसंहार : श्रीसुन्दरदासजी महाराज कहते हैं - हमारे मत में - एक अखण्ड ब्रह्म ही सर्वत्र व्याप्त है, अन्य कोई नहीं । अन्य भ्रमात्मक मतों के विषय में एक ही उदाहरण पर्याप्त होगा कि इस उपर्युक्त मत के विरोधी अन्य भ्रान्त मत उसी प्रकार विलीन हो जायेंगे जैसे सूर्य के उदित होने पर रात्रि का समस्त अन्धकार विलीन हो जाया करता है ॥३८॥
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कठिन बात है ज्ञान की, सुन्दर सुनी न जाइ । 
और कहौं नहिं ठाहरै, ज्ञानी हृदय समाइ ॥३९॥
इति अन्योन्यभेद कौ अंग ॥३१॥
हम लोक में सुनते आ रहे हैं कि सिंहनी का दूध सुवर्णपात्र के अतिरिक्त अन्य किसी पात्र में नहीं ठहरता; उसी प्रकार ब्रह्मज्ञान की साधना भी प्रत्येक साधक के वश की बात नहीं हैं । उसको प्राप्त करने का प्रयास करने वाले हजारों साधकों में कोई एक ज्ञानी ही सफल हो पाता है१ ॥३९॥ 
{१ तु० – श्रीमद्भगवद्गीता : मनुष्याणां सहस्त्रेषु कश्चिद् यतति सिद्धये ।
यततामपि सिद्धानां कश्चिन्मां वेत्ति तत्त्वतः ॥ (७/३)} 
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इति अन्योन्यभेद का अंग सम्पन्न ॥३१॥
अंग समस्त ३१ । साखी संख्या १३५१ ॥
॥ इति श्रीस्वामी सुन्दरदास विरचित साषी ग्रन्थ सम्पन्न ॥

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