रविवार, 16 अगस्त 2026

*२६. भजन प्रताप का अंग ~१/४*

*🙏🇮🇳 #daduji 🇮🇳🙏*
*🌷卐 सत्यराम सा 卐🌷*
*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*२६. भजन प्रताप का अंग ~१/४*
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*स्वर्ग रसातल शेष लग, जहां तहां सब ठाम ।*
*जन रज्जब वन्द हि सबै, जा हिरदै हरि नाम ॥१॥*
स्वर्ग, मृत्यु, रसातल में शेष जी के स्थान तक जहाँ तहाँ सब स्थानों के निवासियों में जिसके हृदय में हरि का नाम रहता है, उसे सभी प्रणाम करते हैं ।
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*जिहिं घट नौबत नाम की, सो प्रकटे संसार ।*
*जन रज्जब जगमग१ रह्या, सेये सिरजन हार ॥२॥*
जिसके अन्त:करण में नाम रूप नौबत बज रही है, अर्थात निरन्तर नाम चिन्तन होता रहता है, वह संसार में सर्वत्र प्रगट हो जाता है । जिसने सृजनहार परमात्मा की भक्ति की है वे जगत् में अपने सुयश प्रकाश से चमक१ रहे हैं ।
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*रज्जब सुकृत नाम की, नित नौबत जहँ बाज ।*
*सो सुनिये सब लोक में, ऊँची अगम अवाज ॥३॥*
नाम चिन्तन रूप शुभ कर्म की नौबत जहाँ भी नित्य बजती है, उसकी आवाज इतनी ऊँची है कि - वह सभी लोकों में सुनती है तथा मन इन्द्रियों के अविषय परमात्मा तक पहुँचती है, अर्थात हरि नाम का चिन्तन करने वाला छिप नहीं सकता ।
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*डाके सुमिरन सुकृत के, दिल सु दमामा साज ।*
*रज्जब छिप सु बजाईये, व्है सब लोक अवाज ॥४॥*
स्मरण रूप शुभ कर्म का डाका डालने के लिये अंतःकरण में सूक्ष्म उच्चारण स्वरुप नगाड़ा वाद्य छिप कर भी बजावे, तो भी उसकी आवाज सब लोकों में पहुँच जाती है, अर्थात भक्त को सभी लोकवासी जान जाते हैं ।
(क्रमशः)

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