बुधवार, 19 अगस्त 2026

*४६. परमारथ कौ अंग २९/३२*

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*#पं०श्रीजगजीवनदासजीकीअनभैवाणी*
*श्रद्धेय श्री @महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी, @Rgopaldas Tapsvi, बाबाजी के आशीर्वाद से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ @Premsakhi Goswami*
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*४६. परमारथ कौ अंग २९/३२*
कहि जगजीवन धरम की, जिन जिन बांधी मोट२ ।
सिर थैं पटकी पाप की, रहै रांम की ओट३ ॥२९॥
(२. मोट=गठरी)   (३. ओट=शरण)
संत जगजीवन जी कहते हैं कि जिन्होंने धर्माचरण की गठरी बांध ली है प्रभु ने उनके पाप की गठरी दूर उतार फैंकी है व अपनी शरण भी दी है ।
कहि जगजीवन धरम की, साध न छांडै बाणि४ ।
हाणि५ हणै लाहा६ गिणै, परम पुरुष पहिचाणि ॥३०॥
{४. बाणि=स्वभाव(आदत)}   {५. हाणि=हानि(नुक्सान)}
संत जगजीवन जी कहते है कि साधुजन धर्म की प्रवृति को नहीं छोड़ते वे हानि लाभ नहीं गिनते वे सब प्रभु को समर्पित कर देते हैं । वे प्रभु को पहचानते हैं ।
हंस हंसनी पै७ पियौ, धर्यौ धर्या की आस ।
रांम रतन धन परगट्यौ, सु कहि जगजीवनदास ॥३१॥
{७. पै=पय(दूध)} 
संत जगजीवन जी कहते हैं कि संतजन व आत्मा परमात्मा दोनो का मेल है यै धर्म की ही आस रख कल वह ही क्षीर पान करते हैं । जिससे राम रुपी रत्न प्रकट होते हैं ।
सिर चढ़ाइ धरि गुहा में, प्रगट किया सुस्थांन ।
कहि जगजीवन दरिद्दर८, दूर किया गुर ग्यांन ॥३२॥
{८. दरिद्दर=दारिद्र्य(निर्धनता)}   
संत जगजीवन जी कहते हैं कि प्रभु मान देते हैं फिर उचित स्थान पर प्रकट भी होता है । इस प्रकार प्रभु अज्ञान दारिद्र्य को दूर करके ज्ञानधन देते हैं ।
(क्रमशः) 

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