*🙏🇮🇳 #daduji 🇮🇳🙏*
*🌷卐 सत्यराम सा 卐🌷*
*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*२३. ध्यान का अंग ~९/१३*
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*ज्यों विषयी पर नारि सौं, अति गति माडे ध्यान ।*
*जन रज्जब जगपति मिले, यूं हरि सौं चित सान ॥९॥*
जैसे कामी नर विशेष कर के पर नारी का ध्यान करता है, वैसे ही यदि हरि के ध्यान में मन लगाया जाय तो जगतपति परमात्मा मिल जाते हैं ।
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*ज्यों भृंगी का ध्यान धर, कीट भृंग ह्वै जाय ।*
*त्यों रज्जब जिव ध्यान धर, जगपति माँहिं समाय ॥१०॥*
जैसे कीट भृंग का ध्यान करके भृंग बन जाता है, वैसे ही जीव ब्रह्म का ध्यान करके ब्रह्म बन जाता है ।
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*पंच तत्त्व घर पंच रस, प्राण तत्त्व घर ध्यान ॥*
*रज्जब रचे बखानियहिं, जो जिहिं ठाहर ठान ॥११॥*
आकाशादि पंच तत्त्वों से रचित पंच ज्ञानेन्द्रियों के घर पंच विषय रूप रस हैं वे विषयों में स्थिर रहती हैं । मन रूप तत्त्व का घर ध्यान है, मन ध्यान में ही स्थिर रहता है । जो जिस स्थान को अपना बनाकर उसमें रत रहता है, उसी का कथन करता है । ईश्वर ध्यान में रत ईश्वर का और मायिक ध्यान में रत माया का कथन करता है ।
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*ध्यान याद सुरति निरति सँभाल, सप्त अष्ट पोषंति१ पाल२ ।*
*धरे३ अधर४ बिच ध्यान जुहोइ, नि५ ध्यान निकट पावे नहीं कोई ॥१२॥*
ध्यान, याद, सुरति, निरति(विचार) सँभालना, इनसे ही सप्त धातु मय स्थूल शरीर का पोषण१ होता है और १.ज्ञानेन्द्रियें पंचक, २.कर्मेन्द्रिय पंचक ३.अन्त:करण चतुष्टय, ४.प्राणदि पंचक, ५.भूत पंचक, ६.काम, ७.त्रिविधकर्म, ८.वासना, इन पुरी अष्ट का भी पालन२ होता है । माया३ तथा ब्रह्म४ के बीच सम्बन्ध करने का कारण ध्यान ही सिद्ध होता है, बिना५ ध्यान निकट रहने पर भी प्रभु नहीं मिलते ।
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*ध्यान म्यान माँहिं रहे, राम काम तरवारि ।*
*रज्जब रुचि के हाथ में, जो जाने सो धारि ॥१३॥*
जैसे म्यान में तलवार रक्खी जाती है, वैसे ही ध्यान में राम तथा काम दोनों ही रक्खे जाते हैं किन्तु विचार द्वारा जिसको अपने कल्याण का कारण समझे उसे ही प्रेम रूप हाथ से ध्यान में रखना चाहिये । कल्याण का साधन राम का ध्यान ही है, अत: राम का ध्यान करना चाहिये, काम का नहीं ।
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इति श्री रज्जब गिरार्थ प्रकाशिका सहित “२३. ध्यान का अंग” समाप्त ॥
(क्रमशः)

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