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रविवार, 23 अगस्त 2026

*२६. भजन प्रताप का अंग ~२९/३२*

*🙏🇮🇳 #daduji 🇮🇳🙏*
*🌷卐 सत्यराम सा 卐🌷*
*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*२६. भजन प्रताप का अंग ~२९/३२*
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*रज्जब एकहि जाप में, जल ज्वाला गुण दोय ।*
*अठारह भार आतम१ उदय, जम सु जवासा जोय ॥२९॥*
जैसे जल में पोषक और शोषक दो गुण दिखाई देते हैं - जल अठारह भारत वनस्पतियों को उत्पन्न करके उनका पोषण करता है किन्तु जवासे को जला डालता है, वैसे ही नाम भी शोषण और पोषण दो गुणों से युक्त है - नाम चिन्तन करने से, नाम अन्त:करण१ में दैवी गुणों को उत्पन्न करके उसका पोषण करता है और आसुर गुणों को नष्ट कर देता है ।
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*रज्जब भागे भजन सुन, अध इन्द्रिय गुण चोर ।*
*ज्यों भुजंग चन्दन तजैं, तरु शिर बोले मोर ॥३०॥*
चन्दन वृक्ष की डाली पर बैठकर मोर बोलता है तब चन्दन पर लिपटे हुये सर्प चन्दन को छोड़कर दूर भाग जाते हैं, वैसे ही भजन की ध्वनी सुनकर पाप, इन्द्रियों के विषयों की आसक्ति, ज्ञान-धन को चुराने वाले काम-क्रोधदि गुण रूप चोर हृदय से भाग जाते हैं ।
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*जन रज्जब राम हीं भजे, पाप रहे नहिं संग ।*
*ज्यों तुपक१ की त्रास सुन, तरुवर तजे विहंग२ ॥३१॥*
जैसे बन्दूक१ की आवाज सुनकर वृक्ष पर बैठे हुये पक्षी वृक्ष२ को छोड़कर उड़ जाते हैं, वैसे ही राम के भजन करने से प्राणी के संग पाप नहीं रहते ।
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*पाले के पर्वत गलहि, देख सूर की ताप ।*
*ऐसी विधि अध ऊतरहिं, जन रज्जब हरि जाप ॥३२॥*
सूर्य की ताप से बर्फ के पर्वत गल जाते हैं, उसी प्रकार हरि नाम के जप से हृदय के पाप उतर जाते हैं ।
(क्रमशः)