॥ दादूराम-सत्यराम ॥
*"श्री दादूदयाल वाणी(आत्म-दर्शन)"*
टीका ~ महामण्डलेश्वर ब्रह्मनिष्ठ पंडित श्री स्वामी भूरादास जी
साभार विद्युत संस्करण ~ गुरुवर्य महामंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमाराम जी महाराज
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*= परिचय का अंग - ४ =*
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*= ब्रह्म साक्षात्कार धारणा =*
*दादू दया दयालु की, सो क्यों छानी होइ ।*
*प्रेम पुलक मुलकत रहै, सदा सुहागनी सोइ ॥१४८॥*
टीका - हे जिज्ञासुओं ! जिन भाग्यवान् मुमुक्षुजनों पर परमेश्वर की कृपा होती है और परमेश्वर को जो अति प्रिय होते हैं, सो छिपे हुए नहीं रहते, क्योंकि वे परमेश्वर के अलौकिक प्रेम में गदगद व प्रफुल्लित होते हुए मुलकते रहते हैं । उन्हीं को परमेश्वर का सदा सुहाग प्राप्त होता है ॥१४८॥
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*दादू बिगसि बिगसि दर्शन करै, पुलकि पुलकि रस पान ।*
*मगन गलित माता रहै, अरस परस मिलि प्राण ॥१४९॥*
टीका - हे जिज्ञासुओं ! आत्मा प्रेमी भक्त "बिगसि बिगसि" कहिए, प्रफुल्लित हो - होकर, परमेश्वर के स्वरूप का दर्शन करते हैं और गदगद होकर राम - रस का पान करते हैं । इस रीति से "प्राण" नाम मुक्तजन, परमेश्वर से "अरस परस" कहिए ओत - प्रोत होकर, शरीर की सुध - बुध को भूल जाते हैं और "गलित" नाम ब्रह्माकार वृत्ति होकर कहिए, आत्मानन्द में माता = मस्त रहते हैं ॥१४९॥
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*दादू देखि देखि सुमिरण करै, देखि देखि लै लीन ।*
*देखि देखि तन मन विलै, देखि देखि चित्त दीन ॥१५०॥*
टीका - हे जिज्ञासुओं ! मुक्तजन स्वरूप का विचार - विचार कर स्मरण करते हैं और लय मार्ग के द्वारा लीन रहते हैं । फिर विचार - विचार कर तन - मन को लै मार्ग से परमेश्वर में अभेद कर देते हैं । विचार - विचार करके चित्त की वृत्ति को स्वस्वरूप में ही लगाते हैं ॥१५०॥
(क्रमशः)

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