॥ दादूराम-सत्यराम ॥
*"श्री दादूदयाल वाणी(आत्म-दर्शन)"*
टीका ~ महामण्डलेश्वर ब्रह्मनिष्ठ पंडित श्री स्वामी भूरादास जी
साभार विद्युत संस्करण ~ गुरुवर्य महामंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमाराम जी महाराज
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*= परिचय का अंग - ४ =*
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*दादू निरखि निरखि निज नाम ले,*
*निरखि निरखि रस पीव ।*
*निरखि निरखि पिव कौं मिलै,*
*निरखि निरखि सुख जीव ॥१५१॥*
टीका - हे जिज्ञासुओं ! मुक्तजन नाम के अर्थ का निर्णय करके स्मरण करते हैं और नित्य - अनित्य का विचार करके राम - रस को पान करते हैं । आत्म - विचार कर - करके अधिष्ठान में अभेद होते हैं । इस प्रकार गुरु के उपदेशों और महावाक्यों का विचार कर - करके जीव - ब्रह्म - सुख को प्राप्त करता है ॥१५१॥
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*परिचय स्मरण नाम पारख लक्षण*
*तन सौं सुमिरण सब करैं, आत्म सुमिरण एक ।*
*आत्म आगै एक रस, दादू बड़ा विवेक ॥१५२॥*
टीका - हे जिज्ञासुओं ! स्थूल शरीर, रसना आदि से तो सभी संसारी प्राणी स्मरण करते हैं, परन्तु "आत्म" कहिए, मन - बुद्धि को एकाग्र करके कोई बिरला ही स्मरण करता है । "आत्म आगै" कहिए परमात्मा में एक रस होना तो विवेकी जनों से ही सम्भव है ॥१५२॥
तन से सुमिरण सब करैं, मन से करै न कोइ ।
जो मन से सुमिरण करै, तो प्रत्यक्ष दर्शन होइ ॥
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*दादू माटी के मुकाम का, सब कोइ जाणैं जाप ।*
*एक आध अरवाह का, बिरला आपै आप ॥१५३॥*
टीका - हे जिज्ञासुओं ! स्थूल शरीर की जाप - विधि तो हरेक जानता है, किन्तु अन्तःकरण में सूक्ष्म रीति से जाप करने वाला तो कोई - कोई ही है, और जो अन्तःकरण ही बाह्य वृत्तियों को विसार कर ब्रह्म में ही सुरति लगाये रहे, वह तो "आपै आप" कहिए, शुद्ध स्वरूप ही हो जाते हैं, परन्तु ऐसा मुक्त पुरुष कोई बिरला ही होता है ॥१५३॥
कवित्त ~
तन की सहाइ सब करत अनेक विधि,
अजर अमर सुख आपको न जानै है ।
कोउ माला फेरत है माला सब स्वारथ की,
जाप ना जपत निज प्रभु को न मानै है ।
बरणी बैठत कोउ, पाठ कर पैसा लेइ,
ऐसा ये अमोल तन बिना बात भानै है ।
जानै नहिं ज्ञान कछु ध्यान धरै बगुला को,
कोटिन में एक कोउ, हरि को पिछानै है ॥
(क्रमशः)

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