सोमवार, 31 दिसंबर 2012

= परिचय का अंग =(४/३२७-९)

॥दादूराम सत्यराम॥
*"श्री दादूदयाल वाणी(आत्म-दर्शन)"* 
टीका ~ महामण्डलेश्वर ब्रह्मनिष्ठ पंडित श्री स्वामी भूरादास जी 
साभार विद्युत संस्करण ~ गुरुवर्य महामंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमाराम जी महाराज 
*= परिचय का अंग - ४ =*
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*रोम रोम रस पीजिए, एती रसना होइ ।*
*दादू प्यासा प्रेम का, यों बिन तृप्ति न होइ ॥३२७॥* 
टीका - हे प्रभु ! हमारे शरीर का प्रत्येक रोम - रोम रसना रूप वक्त्रुत्व शक्ति सम्पन्न होकर राम रस पीवे, ऐसी कृपा कीजिये । क्योंकि आपके प्रेम का जो प्यासा है, उनकी असंख्य रसनाओं के बिना नाम स्मरण व पर्याप्त अमृत रसपान की तृप्ति कैसे संभव है ? एक रसना से तो तृप्ति सम्भव नहीं ॥३२७॥ 
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*तन गृह छाड़ै लाज पति, जब रस माता होइ ।*
*जब लग दादू सावधान, कदे न छाड़े कोइ ॥३२८॥* 
टीका - हे प्रभु ! जैसे व्यवहार में पति - प्रेम में मतवाली पतिव्रता अपने तन, धन, कुटम्बी और पति की लाज को छोड़कर पूर्ण प्रेम - भाव को प्राप्त होवे है । इसी प्रकार भक्तजन भी मीरां आदि की भांति अपने तन - धन, लोक - लाज को छोड़कर पति परमेश्वर से पूर्ण अभेद होते हैं । किन्तु जब तक सब व्यवहारों में सावधान हैं और तन, गृह आदि की क्रियाओं को नहीं त्याग सकते हैं, तब तक पूर्ण प्रेम परमेश्वर का नहीं प्राप्त होता है । अथवा जैसे ही साधक आत्मानन्द को प्राप्त करने के लिये दीवाना बन जाता है, उसी समय लोक - लाज एवं शरीर के स्वामित्व रूपी अध्यासों का परित्याग कर देता है । और वह जब तक इनमें आसक्त है, वृत्ति इधर ही फँसी रहती है और शरीर का अध्यास, लोक - वासना आदि व्यवहारों का त्याग नहीं हो सकता है ॥३२८॥ 
*आंगण एक कलाल के, मतवाल रस मांहि ।*
*दादू देख्या नैन भर, ताके दुविधा नांहि ॥३२९॥* 
टीका - हे जिज्ञासुओं ! जैसे व्यवहार में "कलाल" मद्य बेचने वाले के घर में मद्य पीने - वाले सभी जाति के एकत्रित होते हैं, उनमें उस समय भेदभाव नहीं होता है, इसी प्रकार सतगुरु के आंगन में और व्यापक ब्रह्म के विषय में अर्थात् चैतन्य रूपी कलाल के कहिए, अन्तःकरण में स्वस्वरूप परिचय रूपी रस - पान करके मन, इन्द्रिय और चतुष्टय अन्तःकरण तृप्त हो जाते हैं । जो पुरुष अपने स्वरूप को ज्ञान के द्वारा देख लेता है, उसके फिर द्वैतभाव नहीं रहता है ॥३२९॥ 
"देहं विनश्वरमवस्थितमुत्थितं वा सिद्धो 
न पश्यति यतोSध्यगमत् स्वरूपम् ।
दैवादुपेतमथ दैववशादपेतं वासो 
यथा परिकृतं मदिरामदान्धः ॥"
(भागवत)
ब्रह्मसाक्षात्कर्ता ज्ञानी को भेद - बुद्धि नष्ट हो जाने से देहाध्यास नहीं रहता, जैसे मदान्ध शराबी को अपने देह की सुध - बुध नहीं रहती ।
(क्रमशः)

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