*"श्री दादूदयाल वाणी(आत्म-दर्शन)"*
टीका ~ महामण्डलेश्वर ब्रह्मनिष्ठ पंडित श्री स्वामी भूरादास जी
साभार विद्युत संस्करण ~ गुरुवर्य महामंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमाराम जी महाराज
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*= परिचय का अंग - ४ =*
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*ज्यों ज्यों पीवै राम रस, त्यों त्यों बढै पियास ।*
*ऐसा कोई एक है, बिरला दादू दास ॥३२४॥*
टीका - हे जिज्ञासुओं ! संतजन जैसे - जैसे राम रस पीते हैं, वैसे - वैसे ही उनकी प्यास बढ़ती जाती है । परन्तु ऐसे एक - आध ही विरहीजन भक्त हैं जो इस प्रकार राम - रस पीते हैं ॥३२४॥
"मनुष्याणां सहस्त्रेषु कश्चित् यतति सिद्धये ।
यततामपि सिद्धानां कश्चिन्मां वेत्ति तत्वतः ॥"
(गीता)
सोरठा -
"गागर गलती जोइ, जे हर सिर गंगा बहै ।
तऊ न तृपत होइ, घणैं घणैंरी नै खपै ॥"
दोहा -
अमृत अंत न आवहि, तृप्ति न पीवनहार ।
सोखै बड़वा अनल ज्यों, पोखै सलिता धार ॥
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*राता माता राम का, मतवाला मैमंत ।*
*दादू पीवत क्यों रहै, जे जुग जांहि अनन्त ॥३२५॥*
टीका - हे जिज्ञासुओं ! राम के राते रत्त और माते मत्त कहिए, मतवाले मुक्तजन "मैमंत" कहिए, प्रभु प्रेम में बेसुध हुए, ऐसे अनन्य प्रभु भक्त अनन्त युग - युगान्तर में भी भक्ति - रस का पान करके तृप्त नहीं होते हैं ॥३२५॥
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*दादू निर्मल ज्योति जल, वर्षा बारह मास ।*
*तिहि रस राता प्राणिया, माता प्रेम पियास ॥३२६॥*
टीका - हे जिज्ञासुओं ! परमेश्वर की प्रखर निर्मल ज्योति से भय, अविद्या आदि दोष रहित संतृप्त धन से जिनके चैतन्य रूपी हृदयाकाश में भक्ति - जल वर्षा अनवरत होती ही रहती है, ऐसे संतजन राता = रत्त = अनुरक्त हुये, माता = मस्त रहते हैं । उनकी दिनों - दिन प्रेम की प्यास बढ़ती ही जाती है ॥३२६॥
(क्रमशः)

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