॥दादूराम सत्यराम॥
*"श्री दादूदयाल वाणी(आत्म-दर्शन)"*
टीका ~ महामण्डलेश्वर ब्रह्मनिष्ठ पंडित श्री स्वामी भूरादास जी
साभार विद्युत संस्करण ~ गुरुवर्य महामंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमाराम जी महाराज
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*= परिचय का अंग - ४ =*
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चिड़ी चंचु भरि ले गई, नीर निघट नहिं जाइ ।
ऐसा बासण ना किया, सब दरिया मांहि समाइ ॥३३३॥
टीका - हे जिज्ञासुओं ! जैसे समुद्र से एक चिड़िया पानी की चोंच भरके ले जाए तो समुद्र का पानी कम नहीं हो जाता । इसी प्रकार चैतन्य रूप समुद्र दसों दिशाओं में पूर्णतया व्यापक हो रहा है, परन्तु कोई भी ऐसा भक्त नहीं हुआ, जो सम्पूर्ण परमात्मा को अपने हृदय में ही रख लेवे ॥३३३॥
ननाक - पृष्ठंन च पारमेष्ठयं,
न सार्वभौमं न रसाधिपत्यम् ।
न योगसिद्धिःअपुनर्भवं वा,
समंजसत्वाद्विरहय्य कांक्षे ॥
सर्व मुनि रीझे रामरस, ब्रह्मा विष्णु महेश ।
जगजीवन रस शेष ज्यों, पीवै कोई दिनेश ॥
प्रसंग - गुरु दादू का दर्श कर, अकबर कियो संवाद ।
साखी सुनाइ कबीर की, ब्रह्म सो अगम अगाध ॥
प्रस्तुत साखी का भाव यह है कि जब ब्रह्मऋषि दादू दयाल अकबर बादशाह के यहाँ गए, तब अकबर ने सतगुरु को प्रणाम करके प्रश्न किया कि आप संत क्यों हो गए ? गुरुदेव ने बताया कि परमेश्वर का भजन करने को । अकबर बोला - कबीर ने यह कहा है -
तन मटकी महँ मन मही, प्राण बिलोवणहार ।
तत्त कबीरा ले गया, छाछ पीवे संसार ॥
उपरोक्त साखी से महाराज ने समुद्र का उदाहरण देकर उत्तर दिया कि कबीर जी एक चिड़िया की तरह व्यापक चैतन्य समुद्र से, जितना शक्ति - भर भक्ति रसपान कर सकते थे, उन्होंने करके अपना उद्धार कर लिया । उनके भजन करने से समग्र परमात्मारूपी समुद्र किंचित् भी कम नहीं हुआ । और यह साखी भी इस प्रकार है -
तन है मटकी मन मही, प्राण बिलोवणहार ।
तत्त कबीरा गहि रह्या, औरों को आधार ॥
हे बादशाह अकबर ! उस तत्व को कबीर ने भी ग्रहण किया है और अन्य महापुरुषों को भी उसी तत्व का आधार आ रहा है ।
अकबर बादशाह यह सुनकर नतमस्तक हो गुरुदेव के चरण - स्पर्श किए और कहा- "गुरुदेव ! यही सत्य है ।"
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दादू अमली राम का, रस बिन रह्या न जाइ ।
पलक एक पावै नहीं, तो तबहिं तलफ मर जाइ ॥३३४॥
टीका - हे जिज्ञासुओं ! राम के प्रेमी भक्तजन राम - रस को पीये बिना इस शरीर में वे जीवित नहीं रह सकते । यदि एक पलक भी उनको राम का स्मरण रूपी रस प्राप्त नहीं हो, तो तड़फ - तड़फ कर शरीर त्याग देते हैं ॥३३४॥
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दादू राता राम का, पीवै प्रेम अघाइ ।
मतवाला दीदार का, मांगै मुक्ति बलाइ ॥३३५॥
टीका - हे जिज्ञासुओं ! जो पुरुष राम - रस में राते = रत्त और माते = मत्त मतवाले होकर एक अखण्ड वृत्ति से राम - रस का पान करते हैं, वे भगवान् के दर्शनों में मस्त रहते हैं । जिन संतों ने अभेद भक्ति से परमानन्द अनुभव किया है, वे मुक्ति को तुच्छ समझते हैं अर्थात् अभेद भक्ति द्वारा परमानन्द को प्राप्त हुए बेपरवाही संतजन, मुक्तिआदि की इच्छा नहीं करते हैं ॥३३५॥
(मुक्ति चार प्रकार की हैं - सालोक्य, सामीप्य, सारूप्य, सायोज्य । - सं.)
(क्रमशः)

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