मंगलवार, 1 जनवरी 2013

= परिचय का अंग =(४/३३६-८)

॥दादूराम सत्यराम॥
*"श्री दादूदयाल वाणी(आत्म-दर्शन)"* 
टीका ~ महामण्डलेश्वर ब्रह्मनिष्ठ पंडित श्री स्वामी भूरादास जी 
साभार विद्युत संस्करण ~ गुरुवर्य महामंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमाराम जी महाराज 
*= परिचय का अंग - ४ =*
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*उज्वल भँवरा हरि कमल, रस रुचि बारह मास ।*
*पीवै निर्मल वासना, सो दादू निज दास ॥३३६॥* 
टीका - हे जिज्ञासुओं ! जैसे उज्वल भँवरा बारह मास(काल) कमल के निर्मल रस को प्रीति सहित पान करता है, इसी प्रकार उत्तम पुरुष तो भँवरारूप हैं और हरि कमल - स्वरूप हैं, उनका दर्शन ही निर्मल रस है । इस प्रकार हरि के अनन्य दास हरि दर्शनों में ही सदा मग्न रहते हैं ॥३३६॥ 
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*नैनहुँ सौं रस पीजिये, दादू सुरति सहेत ।*
*तन मन मंगल होत है, हरि सौं लागा हेत ॥३३७॥* 
टीका - हे जिज्ञासुओं ! ब्रह्म परिचयी संतजन विवेक - नेत्रों से समष्टि दर्शन रूप सुधा(अमृत) रस पीते हैं और उनका तन - मन मंगलमय हो रहा है । जिन मुक्त पुरुषों की ब्रह्म से प्रीति लगी है, वे ब्रह्ममय हो रहे हैं ॥३३७॥ 
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*पीवै पिलावै राम रस, माता है हुसियार ।*
*दादू रस पीवै घणां, औरों को उपकार ॥३३८॥* 
टीका - हे जिज्ञासुओं ! भगवान् के जो अनन्य भक्त हैं, सो आप स्वयं तो भक्ति - रस पीकर मस्त रहते हैं और जिज्ञासुजनों को मस्त होते हुए भी बड़ी दक्षता से पिलाते हैं । आप स्वयं भी अखण्ड वृत्ति से राम - रस पीते हैं और श्रद्धालु जिज्ञासुजनों को भी राम - भक्ति - रस पिलाकर अति उपकार करते हैं ॥३३८॥
(क्रमशः)

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