॥ दादूराम सत्यराम ॥
*"श्री दादूदयाल वाणी(आत्म-दर्शन)"*
टीका ~ महामण्डलेश्वर ब्रह्मनिष्ठ पंडित श्री स्वामी भूरादास जी
साभार विद्युत संस्करण ~ गुरुवर्य महामंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमाराम जी महाराज
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*= साधु का अंग १५ =*
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*जहाँ अरण्ड अरु आक थे, तहँ चन्दन ऊग्या मांहि ।*
*दादू चन्दन कर लिया, आक कहै को नांहि ॥१०॥*
टीका ~ हे जिज्ञासुओं ! जहाँ अरण्ड और आक का वन था, उस वन में चन्दन का बूटा उत्पन्न हो जावे, तो सभी वृक्षों में सुगन्धि हो जाने से पथिक लोग उन्हें चन्दन ही करके जानते हैं, आक, अरण्ड नहीं कहते हैं । दार्ष्टान्त में, आक - अरण्ड के समान पामर, निषिद्ध कर्म करने वाले, पाप आदि कर्म करने वाले, के कुल में भक्त उत्पन्न हो जाये, तो उसको तत्त्ववेत्ता पुरुष भक्त ही करके मानते हैं । जैसे - भक्त रैदास, भक्त वाल्मीकि आदि ॥१०॥
आक अरंड लागै नहीं, गुरु चन्दन की बास ।
रीते रहे गठीले पोले, रज्जब परिमल पास ॥
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*साधु नदी जल राम रस, तहाँ पखाले अंग ।*
*दादू निर्मल मल गया, साधु जन के संग ॥११॥*
*ब्रह्मंड हंड चढ़ाइया, मानौं ऊरे अन ।*
*कोई गुरु कृपा तैं ऊबरे, दादू साधू जन ॥११क॥*
टीका ~ हे जिज्ञासुओं ! सच्चे संतजन जो हैं, उनका सत्संग ही मानो नदी है और उस सत्संग मे राम - नाम, भक्ति - वैराग्य - ज्ञान रूपी ही मानो जल भरा है । वहाँ स्नान करने से अन्तःकरण के पाप रूप मल निवृत्त होकर निर्मल होते हैं । ऐसे संतजनों के सत्संग में रहकर अपना कल्याण कर ॥११/११क॥
ज्ञानी दर्शन साध के, सब तीरथ फल होइ ।
अजहूँ महिमा अगम है, बूझै बिरला कोइ ॥
साधु तीरथ ज्ञान जल, मन मंजन कर न्हाइ ।
‘रज्जब’ पाप जुगन के, निश्चै सर्व विलाइ ॥
तस्कर सुत गयो तेल को, हरिजन हाटों मांहि ।
राघो चरचा यों सुनी, सुर के छाया नांहि ॥
दृष्टान्त ~ एक राजा के यहाँ मीणों ने चोरी करने का विचार किया । रात को राजा के महलों में पहुंच गये । जितना चला, उतना माल उठा लाये और लाकर जमीन में दबा दिया कि कुछ दिन के बाद निकालेंगे । पुलिस ने खोज पड़ताल की । कुछ पता नहीं चला । एक दूती, राजा के यहाँ आई और बोली, “मैं चोरी का पता लगा दूँगी ।” एक शेर के दांत उखड़वाये, छः भुजा काठ की बनवाई ।
दूती ने अपना अष्टभुजा दुर्गा का रूप बना कर शेर पर सवारी करके मीणों के मोहल्ले में आधी रात में आ गई । आवाज लगाई - “दुष्टो ! अब राजा को सपना देकर तुम सबको फांसी लगवाऊंगी ।” आस - पास के सोने वाले सब लोग जाग उठे, देखा कि साक्षात दुर्गा है । बोले ~ “हे माता ! क्षमा कर ।” दुर्गा ~ “दुष्टो ! तुमने जो राजा के चोरी की, उसकी चौथ अब तक मेरे नहीं चढ़ाई ।” मीणे ~ “हे माता ! सवेरे ही चौथा हिस्सा तेरे निमित्त लगा देंगे ।”
एक मीणे के लड़के ने आकर देखा कि इसके छाया है । अपने पिता से बोला ~ “पिताजी ! यह दुर्गा नहीं है, यह कोई छल है । मैंने एक साधु से सुना था कि देवता के छाया नहीं होती है, इसके तो छाया है ।” तत्काल मीणे ने दुर्गा के हाथ पकड़े तो काठ का हाथ पाया । तुरन्त तलवार लेकर शेर और दुर्गा के टुकड़े - टुकड़े करके जमीन में दबा दिया । राधोदास जी महाराज कहते हैं कि मीणों के लड़कों ने जैसा संतों का वचन सुना था, उसी से सारे कुटुम्ब की रक्षा कर ली ।
(क्रमशः)
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