शुक्रवार, 18 अक्टूबर 2013

= जीवित मृतक का अंग २३ =(२९/३०)

॥ दादूराम सत्यराम ॥
*"श्री दादूदयाल वाणी(आत्म-दर्शन)"*
टीका ~ महामण्डलेश्वर ब्रह्मनिष्ठ पंडित श्री स्वामी भूरादास जी
साभार विद्युत संस्करण ~ गुरुवर्य महामंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमाराम जी महाराज
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*जीवित मृतक का अंग २३*
*उभय असमाव*
*मैं हूँ मेरी जब लगै, तब लग विलसै खाइ ।*
*मैं नाहीं मेरी मिटै, तब दादू निकट न जाइ ॥२९॥*
टीका ~ हे जिज्ञासुओं ! जब तक मैं हूँ और मेरी है, तब तक अनात्म - वासनाओं द्वारा, संसार के भोगों को भोगता है और जब अहम्ता भाव ही नहीं रहता है, तब ममता और संसार - भाव ही जाता रहता है । फिर वह आत्मस्वरूप में ही अन्तर्मुख वृत्ति से, स्थिर रहते हैं ॥२९॥
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*दादू मना मनी सब ले रहे, मनी न मेटी जाइ ।*
*मना मनी जब मिट गई, तब ही मिले खुदाइ ॥३०॥*
टीका ~ हे जिज्ञासुओं ! सांसारिक मनुष्य नाना प्रकार की मनी=वासना रूप अहंकार मन में ले रखा है । सांसारिक पुरुषों के लिए इस अनात्म - अहंकार का त्याग करना कठिन है । यदि अनात्म - अहंकार को त्याग देवें, तो फिर परमात्मा के मिलने में कोई देर नहीं होती है ॥३०॥
मनामनी सबके लगी, यत्र तत्र परवेश । 
ममता मिटी साहिब मिल्या नाशे सकल कलेश ॥
बन्दों के दरसन गयो, मोहमद मनी फकीर । 
प्रत्यक्ष लखै मार्ग नहीं, दिवाल करी क्यों पीर ॥
दृष्टान्त ~ एक ब्रह्मनिष्ठ निष्पक्ष बेहदी फकीर थे । उनके दर्शन करने बहुत से लोग जाने लगे । मोहम्मद साहब भी कई मुसलमानों को साथ लेकर उनका दीदार करने गये । परन्तु मोहम्मद के दिल में पैगम्बरपने का अभिमान था । सब लोगों को फकीर के दर्शन होने लगे । मोहम्मद फकीर के चारों तरफ घूम लिया, परन्तु उसको दीवार की आड़ दिखाई पड़ती थी । तब बोला ~ पीर ! दर्शन देओ, यह दीवार क्यों कर रखी है ? फकीर बोले ~ हम तो मैदान में बैठे हैं, तेरे दिल की दीवार को गिराकर दर्शन कर, तो दर्शन हो जायेगा । यह सुनकर मोहम्मद का अहंकार चूर हो गया और फकीर का दर्शन पा लिया ।
(क्रमशः)

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