*श्री सन्त-गुण-सागरामृत श्री दादूराम कथा अतिपावन गंगा* ~ स्वामी माधवदास जी कृत श्री दादूदयालु जी महाराज का प्राकट्य लीला चरित्र ~ संपादक-प्रकाशक : गुरुवर्य महन्त महामण्डलेश्वर संत स्वामी क्षमाराम जी ~
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*(“चतुर्थ - तरंग” २६-२७)*
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**काजी कौंस दीया उसका हाथ गला**
मुसलमान ज्यूं राखै मान सांई का माने फरमान ।
सारों को सुखदाई हो, मुसल मानकर मानूं सोई ॥
मोहम्मद पीर कुरान रची वह,
एक चराचर नूर दिखाई ।
जीव हु मारत, तूं शठ खावत,
आगि जबाब किसे विध आई ।
दोजख मांहि परै अतिशय दुख,
यों सुनि के खल रोष कराई ।
काजिन कौंस दई मुख ऊपर,
दादुदयालु हिं चोट लगाई ॥२६॥
पीर मोहम्मद साहब ने कुरान रचकर सबको समझाया था कि - सब जीवों में एक खुदा का ही नूर बसा हुआ है । और तुम जीवों को मारते हो, अपनी जिेा के स्वाद के लिये उन्हें खा जाते हो । आगे जाकर क्या जवाब दोगे । इन करतूतों से तो तुम दोजख(नरक) में ही पड़ोगे । यह सुनते ही काजी रोष में भर गया । उसने दादूजी के मुख पर थप्पड़(कौंस) मारकर चोट पहुँचाई ॥२६॥
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**काजी का हाथ खम्बा के जैसा हो गया**
कौंस दई इक, भूमि कम्पी तब,
दूसर देवत हाथ गह्यो है ।
काजिन ! तोर दुखे कर कोमल,
मोर स्वरूप कठोर भयो है ।
ताहिं संताप भयो दुख पावत,
काजिन पर हरिकोप लह्यो है ।
दूसर हाथ रह्यो नभ ऊपर,
दौरि चल्यो घर जात पर्यो है ॥२७॥
साधु का अपमान होते ही भूमि काँप उठी । काजी ने दूसरा हाथ पुन: चोट देने के लिये उठाया - तभी अविनासी ब्रह्म की सत्ता से काजी का हाथ खम्ब के जैसे खड़ा हो गया श्री दादूजी बोले - अरे काजी ! तेरा हाथ कोमल है, मेरा स्वरूप तो कठोर हो गया है । इस पर चोट मारने से तेरा हाथ दुख जावेगा । उसी क्षण श्री हरि के कोप से काजी के शरीर में दुख:द संताप पैदा हो गया । उसका दूसरा हाथ ऊपर ही स्थंभ हो गया । दर्द और डर से घायल होकर वह घर की तरफ भागा ॥२७॥
(क्रमशः)

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