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*"श्री दादूवाणी प्रवचन पद्धति"*
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
*गुरुदेव का अंग १/११७.१२०*
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अंधे - अंधा मिल चले, दादू बांध कतार ।
कूप पड़े हम देखतां, अंधे - अन्धा लार ॥११७॥
दृष्टांत सोरठा -
रोटी लेकर च्यार, सूरदास मारग चल्यो ।
अन्य प्रति कहा विचार, रोटी ले पहुंचाय दे ॥३०॥
एक सूरदास साधु जिस ग्राम में था उससे दूसरे ग्राम जाने लगा तब भिक्षा की बची चार रोटी भी साथ ले ली । थोड़ी दूर जाने पर विचार किया कोई मुझे अमुक ग्राम पहुँचा दे तो दो रोटी उसे दे दूं । फिर उसने आवाज दी - मुझे कोई अमुक ग्राम पहुँचादे तो उसे मैं दो रोटी दूंगा । एक गरीब सूरदास भूखा बैठा था । उसने सुना तो पास आकर बोला - मुझे दे मैं पुंचा दूंगा । उसने रोटी दे दी । वह रोटी खाकर उसकी लकड़ी पकड़ कर चला ।
आगे जंगल मे मार्ग उनसे छूट गया । खेतों मे चले गये । इनको कूप की ओर जाते देखकर एक व्यक्ति ने आवाज दी - अरे आगे कूप है और पृथ्वी की बराबर ही उसका मुख है ध्यान रखना पड़ नहीं जाना । प्रथम सूरदास ने कहा कूप आगे बता रहा है ध्यान रखना । उसने कहा - मुझे भी तो दीखता है, तुम निश्चिन्त रहो ।
इतने में कूप आ गया । उसका मुख तो पृथ्वी के बराबर था ही पता लगा नही. अंतः दोनों ही कूप में पड़ गये । उक्त प्रकार ज्ञान नैत्रों से हीन अंधे गुरुओं के साथ अज्ञानी प्राणी लगकर संसार कूप में ही पड़ते हैं । कोई विज्ञ पुरुष कहे तो अज्ञानी कह देता है मैं भी तो ज्ञानी हूँ ।
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दादू माया माहे काढकर, फिर माया में दीन्ह ।
दोऊ जन समझै नहीं, एको काज न कीन्ह ॥१२०॥
दृष्टांत -
चेलो भयो जु चौधर, भज्यो तीरथ काज ।
विभव दिखायो अतिघनो, मेरे ही थो राज ॥३१॥
एक श्रीमान् चौधरी को घर से वैराग्य हो गया । अतः वह गुरु की खोज में निकला । उसे एक साधु मिला और उससे पूछा - कहां जाते हो ? चौधरी- गुरु की खोज में जाता हूँ । साधु - हमारे गुरु बहुत अच्छे संत है, उनको गुरु बना लो और भजन करो अन्यत्र क्यों भटकते हो ? चौधरी साधु के साथ गया । उसके गुरु एक मठ मे महन्त थे । दोनों ने जाकर प्रणाम किया फिर चौधरी ने कहा - मुझे शिष्य बना लीजिये । महन्त ने कहा - हम अभी तो तुमको शिष्य मान लेते हैं किन्तु पहले तुम तीर्थ यात्रा करके आओ फिर पक्का शिष्य बनायेंगे ।
वह तीर्थ यात्रा करके आया तब महन्त ने पक्का शिष्य बनाकर और अपना ऐश्वर्य दिखाकर कहा - यब सब अपना ही समझो और इसका उपयोग करते हुये हमारी सेवा करो । उक्त सब सुनकर चौधरी ने कहा - इससे तो मेरे ही बहुत अधिक ऐश्वर्य था । अतः ऐश्वर्य के लिये तो मैं आपके पास नहीं रहूँगा यह यह कहकर चल दिया । किन्तु जो माया(घर से) निकालकर आश्रम की माया में लगा देते हैं वे लगाने वाले और लगने वाले दोनों ही नहीं समझते । उनके व्यवहार और परमार्थ दोनों कायों में वे एक को भी पूरा नहीं कर सकते ।
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अश्विनी कुमार भोक्तव्वं, एवं धर्म सनातनं ॥
एक सज्जन को घर से वैराग्य हो गया । अतः वह एक जटाजूट वाले दर्शनी मूर्ति का दर्शन करके अति प्रभावित हुआ और उनको प्रणाम करके प्रार्थना की - मुझे सनातन धर्म का उपदेश दीजिये । वे एक घोड़ा भी रखते थे । अतः उनकी सेवा को ही उक्त पद्य से सनातन धर्म बताया । तह वह सज्जन वह समझकर कि ये तो भेष मात्र के ही संत हैं । इनके पास सनातन धर्म का उपदेश कैसे मिल सकता है । चल दिया ।

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