卐 दादूराम~सत्यराम 卐
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*श्री वाह्यांतर वृत्ति वार्ता*
रचना ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
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तृतीय दिन ~
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सखी जीव अस एक निहारा,
संग गया तिहिं कूपहिं डारा ।
सजनी कपोत है मैं जानी,
नहिं, कामी गुरु जान सयानी ॥९॥
आ. वृ. - ‘‘एक प्राणी ऐसा देखने में आता है कि - जो उसका साथ करता है, उसे वह कूप में ही डालता है। तू समझी है तो बता वह कौन है?’’
वां. वृ. - ‘‘कबूतर।’’ उसके पंख पर कोई चींटी आदि चढ़ जाती है तो उसे वह कूप में ही ले जाता है।’’
आं. वृ. - ‘‘नहीं, सखि ! यह तो कामी गुरु है। उसका जो भी संग करता है, वह संसार कूप में ही पड़ता है। तू भी सावधान रहना, कहीं ऐसे गुरुओं के फंद में मत आना। यदि उनके फंद में फँस जायेगी तो निश्चय पतन ही होगा।’’
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एक पकड़ बहुते मर जावे,
तो भी उसका त्याग न भावे ।
मच्छी मरतीं गुटिका द्वारा,
मरें मनुज फँस विषय पसारा ॥१०॥
आं. वृ. - ‘‘एक में आसक्त होकर बहुत से मरते हैं किन्तु फिर भी उसका त्याग नहीं करते। बता वह क्या है ?’’
वा. वृ. - ‘‘आटा आदि की गोलियों से मच्छियां मरती हैं।’’
आं. वृ. - ‘‘नहिं सखि ! विषयों में फँसकर मनुष्य बारंबार जन्मते मरते हैं। तू कभी भी विषयों में आसक्त नहीं होना। अनासक्त रहकर कर्तव्य का पालन ही करना। तब ही ब्रह्मानन्द प्राप्त कर सकेगी।
(क्रमशः)

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