॥ दादूराम सत्यराम ॥
*"श्री दादूदयाल वाणी(आत्म-दर्शन)"*
टीका ~ महामण्डलेश्वर ब्रह्मनिष्ठ पंडित श्री स्वामी भूरादास जी
साभार विद्युत संस्करण ~ गुरुवर्य महामंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमाराम जी महाराज
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*जीवित मृतक का अंग २३*
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*मनमुखी मान*
*दादू खोई आपणी, लज्जा कुल की कार ।*
*मान बड़ाई पति गई, तब सन्मुख सिरजनहार ॥३३॥*
टीका ~ हे जिज्ञासुओं ! राम के सच्चे भक्त, अपनी लाज, कुल की काण - मर्यादा, जिन्होंने अन्तःकरण से त्याग कर दी है, फिर मान की इच्छा, बड़ाई की भावना भी उनकी पतन हो गई है, तो उन उत्तम साधकों के सिरजनहार सन्मुख ही है ॥३३॥
प्रतिष्ठा शूकरी - विष्ठा गौरवं घोररौरवम् ।
अभिमानं सुरापानं त्रयं त्यक्त्वा सुखी भवेत् ॥
मान बड़ाई कारणै, बहु धन खरच्यो मूढ़ ।
ताथैं हरि हाथी कियो, फिरै लटकायो सूंड ॥
कबीर कुल खोयां कुल ऊबरै, कुल राख्यां कुल जाइ ।
राम निकुल कुल भेटि लै, सब कुल रह्या समाइ ॥
तुम संगति मैं बहु करी, रहस्य न लीयो जाइ ।
मूंड मुंडा अरु खर चढो, मैं पुनि करी उपाइ ॥
दृष्टान्त ~ एक संत थे । उनके पास एक जिज्ञासु आता । एक रोज वह बोला ~ मैंने आपकी सत्संगति बहुत की, परन्तु आपके हृदय का रहस्य मेरे समझ में नहीं आया । संत बोले ~ मूंड मुंडा ले और गधे पर चढ़, अर्थात् संसार की तरफ से मुंह फेर ले । तब तूं रहस्य को प्राप्त होगा ।
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*परचै करुणा बिनती*
*नूर सरीखा कर लिया, बंदों का बंदा ।*
*दादू दूजा को नहीं, मुझ सरीखा गंदा ॥३४॥*
टीका ~ हे जिज्ञासुओं ! परमेश्वर अपने अनन्य भक्तों को निरभिमान करके अपना स्वरूप बना लेते हैंऔर इस अनात्म अहंकार के समान और कोई भी गन्दा नहीं है । इसलिये वह त्याज्य है ॥३४॥
(क्रमशः)

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