*श्री सन्त-गुण-सागरामृत श्री दादूराम कथा अतिपावन गंगा* ~ स्वामी माधवदास जी कृत श्री दादूदयालु जी महाराज का प्राकट्य लीला चरित्र ~ संपादक-प्रकाशक : गुरुवर्य महन्त महामण्डलेश्वर संत स्वामी क्षमाराम जी ~
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*(“चतुर्थ - तरंग” ३०-३१)*
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**उर्मायल काजी सांभर में**
आय तभीजु उर्मायल काजि हु,
साँभर में करि हैं कुटिलाता ।
संतन सूं शठ बैर बधावत,
नांहि लखी गति ईश्वरकर्ता ।
मैं अब आय हुं, देवहुं त्रासत,
दादु हिं कौन सहायक आता ।
खोदहि गाडहुं, लोहजुं डालहुं,
बाण संधान लगावहुँ माथा ॥३०॥
उसके पश्चात् उमायल नामक दूसरा काजी साँभर में आया । उसने भी श्री दादूजी से कुटिलता प्रारम्भ कर दी । ईश्वर की गति को नहीं पहिचानते हुये वह शठ संत से बैर विरोध करने लगा । और बोला - अब मैं आ गया हूं, देखता हूं - दादू की कौन सहायता करता है ? इस दादू को त्रास दे - देकर मारूंगा । आधा जमीन में गाड दूंगा, लोह - बेड़ियों में जकड़ दूंगा, बाण चलाकर खोपड़ी छेद दूंगा ॥३०॥
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तोप रु तीर सुं शीश उडायहुं,
गुर्रज शैल रु खड्ग कटारी ।
ऐसि सजा कहि पीर करानन,
काफिर भर्महि जो नर नारी ।
भय बिन दीन बन्यो जु खुदा हम,
काफिर आपहि खलक् बिगारी ।
बैर हु भूरि धरी हिरदय शठ,
संत बिना खल होत खवारी ॥३१॥
तोप के आगे बांधकर उड़ा दूंगा,
या शरीर में तीर, भाले, गुर्रज छुरे, कटारें घोंप दूंगा । जो काफिर भोली - भाली जनता को गुमराह करता है - उसकी सजा कुरान में यही कही गई है । भय दिखाने बिना हमारे खुदा का दीन ईमान कैसे बना रहेगा । इस काफिर ने आकर सारा खलक(जन समाज) ही बिगाड़ दिया । इस तरह हृदय में शठता भरे हुये वह अत्यन्त वैर - विरोध करने लगा । संत की संगति बिना खल की मलिनता बढ़ती ही गई ॥३१॥
(क्रमशः)

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