रविवार, 20 अक्टूबर 2013

= च. त./३०-३१ =



*श्री सन्त-गुण-सागरामृत श्री दादूराम कथा अतिपावन गंगा* ~ स्वामी माधवदास जी कृत श्री दादूदयालु जी महाराज का प्राकट्य लीला चरित्र ~ संपादक-प्रकाशक : गुरुवर्य महन्त महामण्डलेश्‍वर संत स्वामी क्षमाराम जी ~
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*(“चतुर्थ - तरंग” ३०-३१)* 
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**उर्मायल काजी सांभर में** 
आय तभीजु उर्मायल काजि हु, 
साँभर में करि हैं कुटिलाता ।
संतन सूं शठ बैर बधावत, 
नांहि लखी गति ईश्वरकर्ता । 
मैं अब आय हुं, देवहुं त्रासत, 
दादु हिं कौन सहायक आता । 
खोदहि गाडहुं, लोहजुं डालहुं, 
बाण संधान लगावहुँ माथा ॥३०॥ 
उसके पश्चात् उमायल नामक दूसरा काजी साँभर में आया । उसने भी श्री दादूजी से कुटिलता प्रारम्भ कर दी । ईश्वर की गति को नहीं पहिचानते हुये वह शठ संत से बैर विरोध करने लगा । और बोला - अब मैं आ गया हूं, देखता हूं - दादू की कौन सहायता करता है ? इस दादू को त्रास दे - देकर मारूंगा । आधा जमीन में गाड दूंगा, लोह - बेड़ियों में जकड़ दूंगा, बाण चलाकर खोपड़ी छेद दूंगा ॥३०॥ 
तोप रु तीर सुं शीश उडायहुं, 
गुर्रज शैल रु खड्ग कटारी । 
ऐसि सजा कहि पीर करानन, 
काफिर भर्महि जो नर नारी । 
भय बिन दीन बन्यो जु खुदा हम, 
काफिर आपहि खलक् बिगारी । 
बैर हु भूरि धरी हिरदय शठ, 
संत बिना खल होत खवारी ॥३१॥ 
तोप के आगे बांधकर उड़ा दूंगा, 
या शरीर में तीर, भाले, गुर्रज छुरे, कटारें घोंप दूंगा । जो काफिर भोली - भाली जनता को गुमराह करता है - उसकी सजा कुरान में यही कही गई है । भय दिखाने बिना हमारे खुदा का दीन ईमान कैसे बना रहेगा । इस काफिर ने आकर सारा खलक(जन समाज) ही बिगाड़ दिया । इस तरह हृदय में शठता भरे हुये वह अत्यन्त वैर - विरोध करने लगा । संत की संगति बिना खल की मलिनता बढ़ती ही गई ॥३१॥ 
(क्रमशः)

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