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*"श्री दादूवाणी प्रवचन पद्धति"*
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
*गुरुदेव का अंग १/६४-८८*
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*घट घट राम रत्न है, दादू लखे न कोइ ।*
*सद्गुरु शब्दों पाइये, सहजैं ही गम होय ॥६४॥*
दृष्टांत -
संत बणिक की हाट पर, सहज हि बैठे आइ ।
क्यों निर्धन तब धन घणों, पारस दियो बताइ ॥१७॥
एक संत बाजार से जा रहे थे । एक वैश्या ने उन्हें प्रणाम करके कहा - विराजिये । संत उसका प्रेम देखकर सहज स्वभाव से बैठ गये । बातों ही बातों में वैश्य ने अपने को निर्धन बताया । उस समय संत की दृष्टी स्वाभाविक ही उसके पत्थर के बाटों पर पड़ी ।
उनमें एक छोटा बाट पारस का था । उसे देखकर संत ने कहा - तुम क्यों अपने की निर्धन मानते हो ? तुम्हारे पास तो बहुत धन है । फिर उसे पारस बताया तथा लोहा उससे छुआ कर सोना बना दिया । तब वह निर्धन न रहकर महाधनी हो गया वैसे ही गुरुजन हृदयस्थ आत्माराम का साक्षात्कार कराकर जीव को परम धनी बना देते हैं ।
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*दादू - मन ही से मल ऊपजे, मन ही से मल धोइ ।*
*सीख चले गुरु साधु की, तो तू निर्मल होइ ॥८८॥*
उक्त साखी के पूर्वार्ध पर युक्ति रूप दृष्टांत जल से कीचड़ ऊपजे जल से कीचड़ धोइ ।
कथा रूप दृष्टांत -
दोय सिद्ध रह बाझ में, सेवक दर्शन जाय ।
कहा हाल मत जाय तू, लियो कीच कुल आय ॥१८॥
एक नगर के बाझ(बाहर) दो सिद्ध संत रहते थे । एक ग्राम के पास और एक कु़छ दूर एक बाग में रहते थे । भक्त लोग दोनों के पास ही दर्शन, सत्संग के लिये जाते थे । एकादशी के दिन वहां का राजा भी दोनों के दर्शन करने चला ।
ग्राम के पास वालों के दर्शन करके कहा - अब मैं बाग वाले संतों के दर्शन करने जा रहा हूं । संत ने कहा - थोड़ी देर ठहर जाओ, वे कीचड़ में दबे हैं । थो़डी देर बाद कहा - अब जाओ, वे कीचड़ से निकल गये हैं ।
राजा गया । संत गुफा में थे । कपाट खोलने की प्रार्थना की । संत ने खोल दिये । प्रणाम आदि करने के पश्चात राजा ने पू़छा आप गुफा में कितने समय से हैं ? संत - तीन घंटे से ।
राजा ने सोचा दोनों में से एक तो अवश्य ही मिथ्यावादी है । फिर राजा बोला - मैं ग्राम के पास के संतजी के दर्शन करके आपके पास आने को उन से कहा तब उन्होंने कहा - वे कीचड़ में दबे हैं, थोड़े ठहर जाओ । फिर कु़छ समय बाद कहा - अब जाओ वे कीचड़ से निकल गये हैं । आप कहते हैं मैं तीन घंटे से गुफा में हूँ और गुफा में कीचड़ है नहीं । फिर उन्होने मिथ्या क्यो बोला ?
संत ने कु़छ सोच कर कहा - उन्होंने सत्य ही कहा था । पूर्व दिन मेरे पूर्व आश्रम के चार भाइयों में से सब से छोटा भाई आया था । उसने कहा - तीनों अलग अलग हो गये हैं किन्तु मुझे उन्होंने बराबर बंटवारा नहीं दिया । अतः आप मेरी सहायता करो और उन से बराबर तीन हिस्से कराओ । तब मुझे उस पर दया आ गई ।
इससे मैं यह सोच रहा था कि तीन हिस्सा बराबर नहीं करेंगे तो मै कहूँगा मेरा हिस्सा भी दो फिर मेरा हिस्सा लेकर उसे दे दूंगा । उक्त प्रकार उस कुल के संबन्धों विचार रूप कीचड़ में दबा था । फिर मैने सोचा - यदि तेरा हिस्सा लेकर उसे दे भी दिया और उसका प्रारब्ध अच्छा नहीं होगा तो वह भी नष्ट हो जायेगा और प्रारब्ध अच्छा होगा तो जो उसे मिला है वह भी बढ़ सकता है ।
मुझे इस प्रपंच में न पड़कर भजन ही करना चाहिये । फिर मैं उस विचार को छोड़कर भजन ही करने लगा । यही कीचड़ से निकलना है । इससे उन्होंने सत्य ही कहा था । उक्त कथा सुन कर राजा भी संतुष्ट हुआ । अंतः कुविचार से ही मल उत्पन्न होता है और सुविचार से दूर होता है । गुरु और संतों के विचारों से निर्मल होता है ।

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