सोमवार, 21 अक्टूबर 2013

= जीवित मृतक का अंग २३ =(३५/३६)

॥ दादूराम सत्यराम ॥
*"श्री दादूदयाल वाणी(आत्म-दर्शन)"*
टीका ~ महामण्डलेश्वर ब्रह्मनिष्ठ पंडित श्री स्वामी भूरादास जी
साभार विद्युत संस्करण ~ गुरुवर्य महामंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमाराम जी महाराज
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*जीवित मृतक का अंग २३*
*जीवत मृत्तक*
*दादू सीख्यों प्रेम न पाइये, सीख्यों प्रीति न होइ ।* 
*सीख्यों दरद न ऊपजै, जब लग आप न खोइ ॥३५॥*
टीका ~ हे जिज्ञासुओं ! इस मनुष्य जन्म में, अनात्म अहंकार को त्यागे बिना, केवल कहने से और सुनने से, परमेश्‍वर का सच्चा प्रेम और सच्ची प्रीति नहीं प्राप्त होती । वैसे ही विरह की बातें करने से, सच्चा विरह का दर्द नहीं उत्पन्न होता है । हे मुमुक्षुओं ! जब तक अपने आपे को नहीं त्यागता, तब तक परमेश्‍वर नहीं मिलता है ॥३५॥
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*कहबा सुनबा गत भया, आपा पर का नाश ।*
*दादू मैं तैं मिट गया, पूर्ण ब्रह्म प्रकाश ॥३६॥*
टीका ~ हे जिज्ञासुओं ! जीवित काल में ही कथन और श्रवण का अहंकार जब मिट गया, तब अपने पराये का भी अध्यास छूट गया । ब्रह्मऋषि कहते हैं कि फिर ‘मैं और तूं’ का भाव भी अन्तःकरण से उठ जाता है । तब वह मुक्तजन ब्रह्मस्वरूप से ही प्रकाशते हैं ॥३६॥
‘बाजिंद’ साध निहचल भये, थकी जु मन की दौर । 
कहिबो सुणबो समझबो, बिन भगवत नहिं और ॥
(क्रमशः)

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