*श्री सन्त-गुण-सागरामृत श्री दादूराम कथा अतिपावन गंगा* ~ स्वामी माधवदास जी कृत श्री दादूदयालु जी महाराज का प्राकट्य लीला चरित्र ~ संपादक-प्रकाशक : गुरुवर्य महन्त महामण्डलेश्वर संत स्वामी क्षमाराम जी ~
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*(“चतुर्थ - तरंग” ३२-३३)*
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**काजी के घर में आग लगी सर्वस जल गया**
आग बिना घर आग लगी तब,
नारि सुता घर छार कराई ।
तूल भरी तहँ सातहिं सौ मण,
लागत आग सबै जरि जाई ।
सम्पति संग जर्यो सबही कुल,
संत सँताप सजा तिनहू पाई ।
ता दिन बैर तज्यो हिरदय डरि,
दादुजि पाँव पर्यो शठ जाई ॥३२॥
ईश्वर - कोप से बिना अग्नि ही उसका घर जल गया । घर में सात सौ मण रूई भरी थी, उसमें अग्नि लगने से घर की सम्पूर्ण नारी और पुत्र - पुत्री भी जल गये । संत को सताने की सजा यह मिली कि - कुल परिवार सहित सब कुछ जलकर राख हो गया । उस दिन से काजी डरने लगा, वैर विरोध छोड़ दिया, और श्री दादूजी के चरणों में जाकर गिर गया ॥३२॥
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**विलंद खान सांभर में**
स्वामि जु तांहि दियो अभय वर,
बैर रखो नहिं बंदि गुन्यो है ।
खान बलिंद जु दिल्ली सुं आवत,
नाम सुन्यो शठ शीश धुन्यो है ।
काजि गृहे सुत नारि जरी सब,
यों सुनि के अति दु:ख भन्यो है ।
कौन सी कहै तिन में अजमो इत,
काफिर आवहि सिद्ध सुन्यो है ॥३३॥
दयालु स्वामी जी ने उसे अभय वर देकर कहा - जीवों से बैर मत रखो, खुदा के सच्चे बंदे बनो । कुछ समय पश्चात् दिल्ली से बलिन्द खान साँभर का शासक बन कर आया । दादूजी का नाम सुनकर वह शठ अपना सिर धुनने लगा । काजी की घटना सुनकर बहुत दु:ख मनाया और बोला - कोई काफिर यहाँ आया हुआ है, सुना है - वह कोई सिद्ध फकीर है । देखें - उसमें कौनसी अजमात(करामात) है ॥३३॥
(क्रमशः)

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