रविवार, 20 अक्टूबर 2013

श्री वाह्यांतर वृत्ति वार्ता(द्वि.दि.- १२/३)

卐 दादूराम~सत्यराम 卐
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*श्री वाह्यांतर वृत्ति वार्ता*
रचना ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥ 
द्वितीय दिन ~ 
आवत करे प्राप्त हो चैना, 
नहीं करे तो उलटे बैना । 
क्या समझी सखि ! वैद्य निदाना, 
नहिं सखि, यह तो है सन्माना ॥१२॥ 
आं. वृ. - ‘‘जिसका व्यवहार आते ही करने से तो आनन्द रहता है और नहीं करने से विपरीत बचन भी सुनने पड़ते हैं। बता वह क्या है?’’
वा. वृ. - ‘‘यह तो रोग का निदान है! वैद्य आते ही रोगी का निदान ठीक-ठीक कर देता है तब तो रोगी और उसके कुटुम्बियों को आनन्द होता है और नहीं करने से वैद्य को विपरीत बचन सुनने पड़ते हैं।’’ 
आ. वृ. - ‘‘नहीं, सखि ! यह तो सन्मान है। घर पर आये व्यक्ति का सम्मान नहीं किया जाता है। तब वह विक्षिप्त होकर दूसरों के सामने उस घर की निन्दा करता है। अत: आगत अतिथि का सम्मान अवश्य करना चाहिये।’’ 
जिहिं न फिरावे दूषित होई, 
पुनि-पुनि फेरत चंगा सोई। 
क्या समझी ! यह नागर पाना, 
नहिं सखि ! यह तो विद्या-ज्ञाना ॥१३॥ 
आं. वृ. - ‘‘जो न फिराने से खराब हो जाता है और फिराने से अच्छा रहता है। बता वह क्या है?’’ 
वा. वृ. - ‘‘यह तो नागर बेलि का पान है।’’ 
आं. वृ. - ‘‘नहिं, सखि ! यह विद्या-ज्ञान है। मनन करते रहने से तो स्मरण रहता है और न मनन करे तो नष्ट हो जाता है। तू सुने ज्ञान का मनन बारंबार किया कर। तभी तुझे आनन्द प्राप्त होगा।’’ 
(क्रमशः)

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