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*श्री वाह्यांतर वृत्ति वार्ता*
रचना ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
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द्वितीय दिन ~
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आवत करे प्राप्त हो चैना,
नहीं करे तो उलटे बैना ।
क्या समझी सखि ! वैद्य निदाना,
नहिं सखि, यह तो है सन्माना ॥१२॥
आं. वृ. - ‘‘जिसका व्यवहार आते ही करने से तो आनन्द रहता है और नहीं करने से विपरीत बचन भी सुनने पड़ते हैं। बता वह क्या है?’’
वा. वृ. - ‘‘यह तो रोग का निदान है! वैद्य आते ही रोगी का निदान ठीक-ठीक कर देता है तब तो रोगी और उसके कुटुम्बियों को आनन्द होता है और नहीं करने से वैद्य को विपरीत बचन सुनने पड़ते हैं।’’
आ. वृ. - ‘‘नहीं, सखि ! यह तो सन्मान है। घर पर आये व्यक्ति का सम्मान नहीं किया जाता है। तब वह विक्षिप्त होकर दूसरों के सामने उस घर की निन्दा करता है। अत: आगत अतिथि का सम्मान अवश्य करना चाहिये।’’
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जिहिं न फिरावे दूषित होई,
पुनि-पुनि फेरत चंगा सोई।
क्या समझी ! यह नागर पाना,
नहिं सखि ! यह तो विद्या-ज्ञाना ॥१३॥
आं. वृ. - ‘‘जो न फिराने से खराब हो जाता है और फिराने से अच्छा रहता है। बता वह क्या है?’’
वा. वृ. - ‘‘यह तो नागर बेलि का पान है।’’
आं. वृ. - ‘‘नहिं, सखि ! यह विद्या-ज्ञान है। मनन करते रहने से तो स्मरण रहता है और न मनन करे तो नष्ट हो जाता है। तू सुने ज्ञान का मनन बारंबार किया कर। तभी तुझे आनन्द प्राप्त होगा।’’
(क्रमशः)

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