रविवार, 20 अक्टूबर 2013

सद्गुरु बरजे शिष करे.१/९६

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*"श्री दादूवाणी प्रवचन पद्धति"* 
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
*गुरुदेव का अंग १/९६*
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सद्गुरु बरजे शिष करे, क्यों कर बंचे काल ।
दह दिशि देखत बह गया, पाणी फोड़ी पाल ॥९६॥
दृष्टांत उक्त साखी के पूर्वार्ध पर -
केशो शिष खाने गयो, गुरु को वचन निवार । 
दव्यो गार तले जाय के, संतन लिया निकार ॥२१॥ 
अब नारायण नगर में दादूजी स्थायी रुप से रहने लगे तो भक्त लोग दूर दूर से दर्शन और सत्संग के लिये आने लगे तब नारायण नरेश और वहां के भक्तों ने दादूधाम पर भोजन व्यवस्था के लिये प्रार्थना की । इससे पूर्व दादूजी महाराज जहां भी रहे वहां भिक्षा अन्न ही पाते थे । किन्तु अब जन समुदाय अधिक आने से दादूजी ने राजा आदि की प्रार्थना मान ली और भोजन दादूधाम पर ही बनने लगा । 
भोजन व्यवस्था का अधिकार दादूजी के शिष्य केशवदासजी को दिया । कारण ? उनमें सेवा भाव की विशेषता थी । दादूजी के लिये पांच तोले बाजरा का दलिया स्वयं केशव दास जी ही बनाते थे । उनके चूल्हे की मिट्टी गिर गई थी । केशवदासजी ने सोचा - चूल्हे के मिट्टी मध्यान्ह में ही लगाना ठीक रहेगा । कारण ? सायंकाल तो उस पर आगत अतिथियों के लिये भोजन बनाना है । चूल्हा ठीक करना भी वे गुरुजी की मुख्य सेवा ही समझते थे । अतः स्वयं ही मिट्टी लाने जाने लगे तब दादू जी ने उनको जाते देखकर पू़छा - कहां जाते हो ? केशवदासजी - चूल्हे की मिट्टी पड़ गई है, अतः उसके लगाने के लिये मिट्टी लाने जाता हूँ । दादूजी - अभी मत जाओ, अपने आसन पर बैठकर ब्रह्म भजन करो । 
गुरुजी का उक्त वचन सुनकर केशवदासजी रुक तो गये किन्तु फिर सोचा - सायंकाल तो भोजन व्यवस्था का कार्य करना है, मिट्टी ला नहीं सकूंगा और देर हो जाने से मिट्टी सुखेगी भी नहीं और बिना सूखे उस पर भोजन बनाना उचित नहीं रहेगा । फिर दादूजी नहीं देख सकें ऐसे मार्ग से खाने(मिट्टी की खानि) पर चले गये और ज्यों ही मू़रड(चूने के समान सफेद मिट्टी) की खानि में पाहुड़ी मारी त्यों ही खानि के ऊपर का बहुत बडा भाग टूट कर उनके ऊपर आ पड़ा । वे उसके नीचे दब गये । दादूजी को अपनी योग शक्ति से ज्ञात हो गया । उन्होंने अपने शिष्य संतो से कहा । तब संत गये उनका प्राणान्त हो चुका था । अतः दादूजी की आज्ञा से शव को निकालकर भैराणा पर्वत पर रख आये । वहॉं पशु पक्षियों का भोजन बन गया । गुरु वचन नहीं मानने का परिणाम अच्छा नहीं होता. 
द्वितीय दृष्टांत - 
सु गुरु वचन नहिं सत करे, सो कुल कल्मष ढोर ।
जन राधो प्रतीति बिन, भयो साह से चोर ॥२२॥
एक वैश्य ने अपने प्रदेश के प्रधान संत से कहा - मुझे शीघ्र से शीघ्र ईश्वर प्राप्ति का उपाय बताओ । संत - बता तो देंगे किन्तु कर नहीं सकेगा । वैश्य - मै अवश्य करुंगा, आप तो बतावें । संत- निर्जन वन मे जाकर वहां के पीपल वृक्ष के नीचे चिता चुनकर अग्नि लगा देना फिर पीपल पर चढ़कर उस आग्न में कूद जाना । आग्न में पड़ने से पहले ही ईश्वर तुझे झेल लेंगे । उसने व में जाकर वैसे ही किया और पीपल पर चढ़कर सोचने लगा - साधु ने मजाक में कह दिया है । आग में कूदने से शरीर ही भस्म होगा । ईश्वर कैसे मिल सकेगा ? नीचे उतर आया । फिर सोचा- साधु तो अच्छे हैं वे मिथ्या तो नहीं बोलते । फिर चढ़ा और पूर्ववत विचार करके उतर आया ।
एक चोर राजमहल में चोरी करके धन लाया था । उसने इससे उतरने -चढ़ने का कारण पू़छा । वैश्य ने अपनी उक्त कथा सुनादी । चोर ने सोचा संत तो सत्य बोलते हैं । मेर पीछे राज पुरुष लगे है । वे मुझे पकड़ कर मारेंगे भी और धन भी छीन लेंगे तथा जेल में भी डालेंगे । अतः क्यों न धन देकर संत वचन ले लूं । फिर चोर ने धन देकर संत वचन ले लिया । वैश्य भी प्रसन्न हो गया । इतने में राज पुरुष आ गये । वैश्य के पास धन मिलने से उसे पीटा । धन भी छीन लिया और जेल में भी डाल दिया । 
चोर पीपल पर चढ़ कर आग्न पर कूदा कि बीच में ही भगवान् ने झेल लिया और चतुर्भुज रुप का दर्शन देकर कृतार्थ कर दिया । उक्त कथा से सिद्ध होता है कि जो गुरु वचनों को सत्य नहीं मानता सो अपने कुल में कल्मष(पाप) रुप ही होता है । देखो संशय करके उक्त वैश्य साहूकार था किन्तु चोर हो गया । चोर ने सत्य माना तो भगवान को प्राप्त हो गया ।

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