॥ दादूराम सत्यराम ॥
*"श्री दादूदयाल वाणी(आत्म-दर्शन)"*
टीका ~ महामण्डलेश्वर ब्रह्मनिष्ठ पंडित श्री स्वामी भूरादास जी
साभार विद्युत संस्करण ~ गुरुवर्य महामंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमाराम जी महाराज
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*जीवित मृतक का अंग २३*
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*दादू जीवित मृतक ह्वै रहै, सबको विरक्त होइ ।*
*काढ़ो काढ़ो सब कहैं, नाम न लेवै कोइ ॥४३॥*
टीका ~ हे जिज्ञासुओं ! जैसे मृतक शरीर को देखकर सभी घर वाले कहते हैं कि इसको घर से बाहर निकालो, श्मशान में ले जाकर जलाओ । कोई भी कुटम्बी नहीं कहते कि आज - आज तो इसको रहने दो । इसी प्रकार जो संसार से उदासीन रहकर निष्काम हो गये हैं, उन भक्तों को देखकर संसारीजन उनसे अप्रसन्न और उदासीन रहते हैं ॥४३॥
रूप सनातन भ्रात द्वै, वैभव भूप प्रमान ।
त्यागा कागद कपट कर, किन्हुँ न पूछे आन ॥
दृष्टान्त ~ अमर और संतोष नाम के दो भाई बंगाल के बादशाह हुसैनशाह के मंत्री थे । उन्होंने अपने बुद्धि - बल से इतना ऊँचा पद प्राप्त कर लिया और खूब धन कमाया । मंत्री पद त्यागने के बाद वे दोनों अपने भाई बन्धु व संबंधियों के साथ ठाठ से रहने लगे । इनके सम्बन्धी भी इनसे बहुत आदर और प्रेम का व्यवहार करते थे ।
एक दिन चैतन्य महाप्रभु वृन्दावन जाते हुए इन्हें रास्ते में मिल गये । उनकी शरणागत होने पर उन्होंने इन दोनों का नाम रूप और सनातन रख दिया । महाप्रभु के उपदेश से इन्हें वैराग्य हो गया । घर आकर इन्होंने सब धन गरीबों को लुटा दिया और संसार को असार जानकर वीतराग भाव से अन्यमनस्क होकर घर में रहने लगे । सांसारिक सगे सम्बन्धी भी इन्हें भारस्वरूप समझने लगे और इनके साथ उपेक्षापूर्ण और अनादर भाव का व्यवहार करने लगे । अन्त में लोगों के इस कपटपूर्ण व्यवहार से दुःखी होकर वृन्दावन में वानप्रस्थ जीवन व्यतीत करने चले गये । तभी कहा है कि जीवित मृतक होने पर सहज रूप में सांसारिक सम्बन्ध स्वतः ही टूट जाते हैं ।
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*जरणा*
*सारा गहिला ह्वै रहै, अन्तरयामी जाणि ।*
*तो छूटै संसार तैं, रस पीवै सारंगपाणि ॥४४॥*
टीका ~ हे जिज्ञासुओं ! सभी मुक्त पुरुष अन्तर्यामी परमेश्वर का साक्षात्कार करके, उसके प्रेम में अर्थात् आत्म - चिन्तन में पूर्ण सावधान होकर तथा संसार के पदार्थों से और व्यवहार से उदासीन होकर रहते हैं । इस प्रकार संसार - भाव से मुक्त होते हैं और अभेद निश्चय रूपी राम - रस पीते हैं ॥४४॥
असमंजस नृप को तनय, योग भ्रष्ट सोइ आहि ।
बाल अयोध्या के किते, सरयू दिया डुबाहि ॥
दृष्टान्त ~ अयोध्या के राजा सगर की छोटी रानी भानुमती का पुत्र असमंजस योगभ्रष्ट था । उसने कितने ही अयोध्या के लड़के लेजा - लेजा कर सरयू नदी में डूबा दिये । जब राजा को पता चला, तो राजा ने उसको वनवास दे दिया । जब वनवास में जाने लगा, तब जितने लड़के अयोध्या में डुबोये थे, सब को वापिस जीवित कर गया और ब्रह्मध्यान में स्थिर होकर निर्द्वन्द्व होकर विचरने लगा । भक्त को कोई पहचान न सके, अतः वह बावला सा बनकर ऐसे कार्य करता है ।
(क्रमशः)

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