शुक्रवार, 25 अक्टूबर 2013

= च. त./४०-१ =


*श्री सन्त-गुण-सागरामृत श्री दादूराम कथा अतिपावन गंगा* ~ स्वामी माधवदास जी कृत श्री दादूदयालु जी महाराज का प्राकट्य लीला चरित्र ~ संपादक-प्रकाशक : गुरुवर्य महन्त महामण्डलेश्‍वर संत स्वामी क्षमाराम जी ~
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*(“चतुर्थ - तरंग” ४०-४१)* 
**श्री दादूजी का सात घरों में सात स्वरुप** 
एक समै परचा जन देखत, 
नूतहिं सात घरां जन दीन्हे । 
स्वामि जु ध्यान धरें घट भीतर, 
भक्त - रची, मन में लखि लीन्हे । 
ऐसी रची कर्ता जिनके हित, 
नांहि लखी गति, काहु न चीन्हे । 
आवत भक्त बुलावत संत हु, 
स्वामि स्वरूप चले उठि भीन्हे ॥४०॥ 
एक समय साँभरवासियों ने स्वामीजी का चमत्कार परखने के लिये उन्हें एक साथ - सात घरों में भोजन का निमन्त्रण दिया । स्वामीजी ने ध्यान के समय भक्तों की इस रचना को मन ही मन जान लिया । कर्ता परमेश्वर की माया से उन्होंने ऐसी लीला की, जिसे कोई नहीं पहचान पाया । जो भी भक्त बुलाने आया, उसी के साथ उठकर चल दिये ॥४०॥ 
सात घराँ हरि भोजन पावत, 
संतजु ईश्वर को उर राख्यो । 
भक्त महोत्सव मोद भरे अति, 
प्रीति बढ़ी हरि को रस चाख्यो । 
देखत तुर्क भये सब स्तम्भित, 
पीर खुदाई खुशी सब भाख्यो । 
दोष स्वभाव गयो खल को सब, 
साँभर शहर खुशी अब आख्यो ॥४१॥ 
हृदय में ईश्वर का स्मरण करते हुये दादूजी ने सातों घरों में एक साथ भोजन पाया । वस्तुत: दादूजी तो हरिध्यान में संलग्न अपने आसन पर ही विराजे रहे, श्री हरि ने उनका स्वरूप धारण करके सातों घरों में भक्तों की कामना पूर्ण की । इस चमत्कार से भक्तों में दादूजी के प्रति और अधिक प्रीतिभाव बढ़ गया । उन्होंने आनन्द के साथ सत्संग महोत्सव सम्पन्न किया । यह देखकर तुर्क - हिन्दु सभी आश्चर्य चकित रह गये । तुर्क श्री दादूजी को खुदा तुल्य पीर मानने लगे, उनका खल - दोष दूर हो गया । साँभर शहर में सर्वत्र प्रसन्नता का वातावरण छा गया ॥४१॥ 
(क्रमशः)

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