॥ दादूराम सत्यराम ॥
*"श्री दादूदयाल वाणी(आत्म-दर्शन)"*
टीका ~ महामण्डलेश्वर ब्रह्मनिष्ठ पंडित श्री स्वामी भूरादास जी
साभार विद्युत संस्करण ~ गुरुवर्य महामंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमाराम जी महाराज
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*जीवित मृतक का अंग २३*
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*गूंगा गहिला बावरा, सांई कारण होइ ।*
*दादू दीवाना ह्वै रहै, ताको लखै न कोइ ॥४५॥*
टीका ~ हे जिज्ञासुओं ! ब्रह्मनिष्ठ मुक्त पुरुष स्वस्वरूप को प्राप्त करके, ‘‘नामदेव गूंगे भये, गहिले भये जड़भर्त बाल्मिक बाबले भये ।’’ अर्थात् अपनी इष्ट सिद्धि के लिये गूंगे कहिये, वाणी चेष्टा रहित होकर, एवं गहिला, संकल्प से भी संसार से व्यवहार नहीं करते । इस तरह आत्म - दीवाने रहते हैं कि कोई उनको भक्त रूप में पहचान भी नहीं सकते ॥४५॥
रिषभदेव गूंगे भये, गहिले भये जड़भरथ ।
वामदेव बावल भये, सुन्दर जानि अरथ ॥
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*जीवत मृत्तक*
*जीवित मृतक साधु की, वाणी का परकास ।*
*दादू मोहे रामजी, लीन भये सब दास ॥४६॥*
टीका ~ हे जिज्ञासुओं ! गुणातीत ब्रह्मनिष्ठ जीवनमुक्त संतों की वाणी से आत्मज्ञान का प्रकाश होता है और फिर जिसको श्रवण करके, रामजी महाराज भी मोहित हो जाते हैं तथा साधक पुरुष स्वस्वरूप में लीन होते हैं एवं संसार में उस वाणी को सुनकर, पंडित लोग चकित होते हैं ॥४६॥
(क्रमशः)

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