शनिवार, 26 अक्टूबर 2013

= च. त./४२-३ =


*श्री सन्त-गुण-सागरामृत श्री दादूराम कथा अतिपावन गंगा* ~ स्वामी माधवदास जी कृत श्री दादूदयालु जी महाराज का प्राकट्य लीला चरित्र ~ संपादक-प्रकाशक : गुरुवर्य महन्त महामण्डलेश्‍वर संत स्वामी क्षमाराम जी ~
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*(“चतुर्थ - तरंग” ४२-४३)* 
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सेवक - अन्न लहें गुरु भोजन, 
यों जल के संग पीस पिये हैं । 
खीर रु खांड मिलाय लहे सब, 
यौ नित सेवक सेव किये हैं । 
गोविन्द विठ्ठ महेश दमोदर, 
खेम रु लाल के भाव भये हैं । 
टीकम प्रेम हि है हरिदास जु, 
स्वामि हु पंकज पाद धये हैं ॥४२॥ 
सेवकों द्वारा लाया हुआ अन्न भोजन दादूजी जल के साथ पीसवाकर ग्रहण कर लेते । कोई खीर खांड लाता तो - अन्य सामग्री में मिलाकर पी जाते । स्वाद के लिये अलग - अलग नहीं जीमते । गोविन्द, विट्ठल, महेश, दामोदर, खेमाराम, लालाराम, टीकम प्रेमचन्द, हरिदास आदि सेवक नित्य चरण सेवा में लगे रहते ॥४२॥ 
*कुछ निन्दक लोगो के हृदय में आग लग गई* 
निन्दक काजि रु विप्र हुते पुर, 
तां उर अन्तर आग जरे है । 
पावक ज्यूं जरि है तन भीतर, 
दौरि के स्वामिहुपाद परे हैं । 
सहाय करो मम, आप दया कर, 
पावक ज्यों तन मोहि जरे हैं । 
आप दया करि तोय दियो तब, 
शीतल होवहि ताप हरे हैं ॥४३॥ 
जो निन्दक काजी और विप्र थे, उनके शरीर में अन्तर्दाह उत्पन्न हो गया । प्रज्वलित पावक के समान उनका शरीर भीतर से जलने लगा । तब वे दौड़ कर स्वामीजी के चरणों में गिर पड़े । स्वामीजी ने दया करके अपने कमण्डलु का जल उन्हें पिलाया, तब उनका अन्त: संताप शांत हो गया ॥४३॥ 
(क्रमशः)

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