मंगलवार, 22 अक्टूबर 2013

= २७ =


#daduji
卐 सत्यराम सा 卐
*आत्म तत्व विचार निरंतर,* 
*कियो सकल कर्म को नाश ।* 
*घी सो घोट रह्यो घट भीतर,* 
*सुख से सोवै सुन्दरदास ॥* 
*और कछु उर में नहीं आवै,* 
*भावै कोई कहो पचास ।* 
*घी सो घोट रह्यो घट भीतर,* 
*सुख से सोवै "सुन्दरदास" ॥* 
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साभार : Rajiv Jayaswal ~ 
ईश्वर निराकार है, साकार है, गोरा है, काला है, मूर्ति में है, मूर्ति में नहीं है -- इस बहस में मत पड़ो । तुम ईश्वर के बारे में क्या सोचते हो, इस से ईश्वर को कोई फर्क नहीं पड़ता । तुम अपने को देखो, अपने कर्मों को देखो, अपने अंतर के स्वरुप की चिंता करो । 
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एक सर्व शक्तिमान, सर्व व्यापक शक्ति जो जगत को चला रही है, वही ईश्वर है, उस को जैसे चाहो, वैसे सिमरन करो । ईश्वर कोई तर्क की वस्तु नहीं है, आस्था की वस्तु है ।

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