बुधवार, 23 अक्टूबर 2013

= जीवित मृतक का अंग २३ =(३९/४०)

॥ दादूराम सत्यराम ॥
*"श्री दादूदयाल वाणी(आत्म-दर्शन)"*
टीका ~ महामण्डलेश्वर ब्रह्मनिष्ठ पंडित श्री स्वामी भूरादास जी
साभार विद्युत संस्करण ~ गुरुवर्य महामंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमाराम जी महाराज
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*जीवित मृतक का अंग २३*
*पीसे ऊपर पीसिये, छांणे ऊपर छांण ।*
*तो आत्म कण ऊबरै, दादू ऐसी जाण ॥३९॥*
टीका ~ हे जिज्ञासुओं ! जीवित काल में ही नाना प्रकार की वासना और देह अध्यास को विचार - विचार कर त्यागना ही पीसना और छानना है । और फिर ब्रह्माकार वृत्ति का अन्तर खंड अभ्यास करने से ही आत्म - प्रकाश होता है ॥३९॥
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*पहली तन मन मारिये, इनका मर्दे मान ।*
*दादू काढे जंत्र में, पीछे सहज समान ॥४०॥* 
टीका ~ हे जिज्ञासुओं ! इस जीवित अवस्था में ही प्रथम तन - मन को गुण - विकारों से रहित करिये अर्थात् अन्तर्वासनाओं का मर्दन करें, कहिये, त्यागें । और फिर अपने आपको निरभिमानता रूप कसौटी से निकाल कर, ‘सहज’ कहिये, निर्द्वन्द्व स्वरूप बना ले ॥४०॥
काया मारै स्वाद तज, मन मारै भज नाथ । 
रज्जब गढ़ घेर्‍यां बिना, गढ़पति चढ़ै न हाथ ॥
(क्रमशः)

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