गुरुवार, 24 अक्टूबर 2013

गुरु पहले मन से कहैं १/१०९/१११/११५

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*"श्री दादूवाणी प्रवचन पद्धति"* 
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
*गुरुदेव का अंग १/१०९/१११/११५*
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गुरु पहले मन से कहैं, पीछे नैन की सैन ।
दादू शिष समझे नहीं, कह समझावे बैन ॥१०९॥
दृष्टांत - मन की जगजीवन लही, नैन सैन गोपाल । 
वचन रज्जब बखने लही, गुरुदादू प्रतिपाल ॥२८॥ 
जगजीवन एक द्राविड़ी पंडित थे और काशी से दिग्विजय करते हुए आमेर आये थे और आमेर के पंडितों को शास्त्रार्थ के लिये कहा तथ अपनी विजय के प्रमाण पत्र भी बताये । तब पंडितों ने सोचा - इन्हें जीतना कठिन है । इनको दादूजी के पास ले चलें, वहां ही हार जीत का निर्णय हो जायगा । सब पंडित जगजीवन को साथ लेकर दादूजी के पास गये । दादूजी से पंडित जगजीवन ने अनेक प्रश्‍न किये । तब दादूजी ने मन में विचार किया - यह भगवत् भजन करे तो इसका कल्याण हो जाय, नहीं तो यह दूसरों क्लेश ही देता रहेगा । उक्त विचार दादूजी के मन के जगजीवन ने पहचान लिये तब दादूजी ने कहा - 
पंडित राम मिले सो कीजे, 
पढ़-पढ़ वेद पुराण बखाने, सोइ तत्व कह दीजे ॥टेक॥ 
सीकरी सत्संग के पॉंचवे दिन राजा बीरबल दादूजी को बादशहा अकबर के पास ले जा रहा था । मार्ग में एक भेषधारी के साथ भिक्षा मॉंगते हुये जनगोपाल को देखा । जनगोपाल उस भेषधारी के साथ १२ वर्ष से थे । दादूजी की दृष्टि जनगोपाल पर पड़ी । दादूजी ने तत्काल जनगोपाल का भूतकाल का जीवन जानकर सोचा यह वैश्य जाति में उत्पन्न होकर भी अपना सभी जीवन भिक्षा मॉंगने में ही व्यतीत कर देगा । इसी समय जनगोपाल की दृष्टी भी दादूजी पर पड़ी । तब दादूजी ने अपने नेत्र संकेत से समझ गये और दादूजी के पास आ गये । दादूजी के शिष्य होकर अच्छे संत व संत कवि भी हो गये । 
दादू कहि-कहि मेरी जीभ रही, सुन-सुन तेरे कान । 
सद्गुरु बपुरा क्या करे, जो चेला मूढ़ अजान ॥१११॥ 
दृष्टांत - सासु देत सीख बहू कीड़ी को गिनत जात, गिनत गिनत दिन बीत गयो सबहू । सुन्दरदास ~ एक सासु अपनी पुत्र वधू को शिक्षा दे रही थी और वह भी हुँकारा दे रही थी । बहुत समय के बाद सासु ने पु़छा - क्या सुना ? बहू ने कहा - उस बिल से निकलकर सा सौ नौ कीड़ी गई हैं । उक्त प्रकार गुरुजी के कहते कहते और शिष्य के सुनते सुनते चिरकाल बीत जाता है, किन्तु वास्तव तत्व पर शिष्य की बुद्धि न लगकर सांसारिक संकल्प विकल्प ही करती रहती है ऐसी स्थिति में अच्छा गुरु भी क्या करे ? 
गुरु अपंग पग पंख बिन, शिष शाखों का भार । 
दादू खेवट नाव बिन, क्यों उतरेंगे पार ॥११५॥ 
दृष्टांत - देखि कंसला दुखित अति, चींटी लगी अनेक । 
पहले ये सब शिष्य थे, यह इनका गुरु एक ॥२९॥ 
एक दिन दादू जी आमेर में भ्रमण कर के मार्ग से आश्रम को आ रहे थे और पीछे पीछे कई शिष्य आ रहे थे । मार्ग के किनारे पर एक कंसला पड़ा था । उसके हजारों चींटीयॉं लग रही थीं । उस पर दादूजी को दृष्टि पड़ गई । दादूजी ने खडे होकर ध्यान द्वारा देखा तो ज्ञात हुआ यह कंसला पूर्व जन्म में इन चींटियों का गुरु था । इनसे भेंट ले ले कर तो खाता रहा किन्तु इनको इनका कल्याण हो ऐसा उपदेश नहीं देता था । इसी से गुरु कंसला बना और शिष्य चींटियॉं बनी है । पूर्व जन्म में गुरुने इनका धन खाया था । अब शिष्य इसको चींटियॉं बनकर खा रही है । इतने में शिष्य आ गये और पू़छा - आप कैसे खड़े रह गये ? तब दादूजी ने चींटियॉं लगे कंसले को दिखाकर उक्त कथा सुना दी और शिष्यों को सचेत कर दिया कि - ऐसा नहीं करना । कहा भी है - 
गुरुवो बहवः सन्ति शिष्य वित्ताप हारकाः । 
तमेक दुर्लभं मन्ये शिष्यहृत्ताप हारकः ॥

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