卐 दादूराम~सत्यराम 卐
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*श्री वाह्यांतर वृत्ति वार्ता*
रचना ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
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तृतीय दिन ~
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दोउ सदा से होते आये, इक से सुख दूसरा रुलाये ॥७॥
जन्म-मरण सजनी मैं जानी, नहिं सखि । सज्जन दुर्जन प्रानी ॥
आं. वृ. - ‘‘दो अनादि काल से होते आ रहे हैं। एक से प्रानी सुखी होते हैं और दूसरे से दु:खी होते हैं। बता वे कौन हैं?’’
वा. वृ. - ‘‘जन्म-मरण हैं।’’
आं वृं - ‘‘ये तो सज्जन दुर्जन हैं। सज्जनों से सबको सुख और दुर्जनों से सबकों दुख ही होता है। तुझे दुर्जनों से दूर रह कर सज्जनों का ही संग करना चाहिये।’’
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एक पुरुष सागर से जाया, बहुतन प्रिय कुछ को न सुहाया ।
है यह चन्द्र सखी । मैं जानी, नहिं धनवन्तरि वैद्य सयानी ॥८॥
आ. वृ. - ‘‘एक पुरुष समुद्र से उत्पन्न हुआ है। वह बहुतों को प्रिय है किन्तु कुछ को अप्रिय भी है। बता वह कौन है?’’
वा. वृ. - ‘‘चन्द्रमा। सूर्यमुखी कमल, चोरादि की चन्द्रमा का प्रकाश प्रिय नहीं होता है।’’
आं. वृ. - ‘‘नहीं, सखि ! यह तो धनवन्तरि वैद्य है। रोगों को नाश करने से बहुतों को तो प्रिय है किन्तु बूटी आदि को प्रिय नहीं होता। नाशक प्रिय नहीं होता यह प्रसिद्ध है सखि ! तू कभी किसी के नाश का कार्य न करना तभी सर्वप्रिय हो सकेगी।
(क्रमशः)

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