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*"श्री दादूवाणी प्रवचन पद्धति"*
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
*गुरुदेव का अंग १/९६*
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*दादू हूं की ठाहर है कहो, तनकी ठाहर तूं ।*
*री की ठाहर जी कहो, ज्ञान गुरु का यों ॥९९॥*
प्रसंग कथा - गुरु दादू-पै आय के, भर्यो कलावत नाद ।
ता को यह साखी कही, हरि बिन बोलन बाद ॥२३॥
एक दिन आमेर में फतू नामक कलावत(गायक) दादूजी के दर्शन तथा प्रवचन सुनने दादू आश्रम में आया था । प्रवचन समाप्ति पर उसने भजन गाने के लिये अपना वाद्य उठाया और स्वर बांधने के लिये हूं तन रो आदि शब्द बोलने लगा, तब परमज्ञानी दादूजी ने उक्त गुरुदेव के अंग की ९९ नं. की साखी कही थी ।
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*दादू अवगुण गुण कर माने गुरु के सोई शिष्य सुजान ।*
*सद्गुरु अवगुण क्यों करे, समझे सोइ सयान ॥१०३॥*
दृष्टांत - गल काटत नैना ढँके, अवगुण ही गुण जाण ।
मन प्रतीति ऐसी करे, सोई शिष्य सुजाण ॥२४॥
एक गुरु और एक शिष्य मध्यान्ह में एक वट-वृक्ष के नीचे विश्राम कर रहे थे । शिष्य नींद में था । गुरु जाग रहे थे । उन्होंने शिष्य की ओर एक काले सर्प को आते देखकर उसे रोकते हुये गुरु बोले - भाई ! आगे कहां जायेगा ? सर्प- तुम्हारे शिष्य ने पूर्व जन्म में मेरे कण्ठ का रक्त पान किया था । अतः मैं भी इसके कण्ठ स्थान में काटकर इसका रक्त पीऊंगा । संत - तेरा बदला तो कण्ठ का रक्त पीने का ही है और तो कु़छ नही ? सर्प - हां अन्य तो कु़छ नहीं है । सन्त - अच्छा ठहर मैं तुझे इसके कण्ठ का रक्त निकाल कर देता हूं ।
संत ने चाकू निकाला और शिष्य की छाती पर बैठ कर कण्ठ के चीरा देने लगे तब शिष्य जग गया और गुरु को अपना कण्ठ काटते देखा तथा यह सोचकर कि गुरु कर रहे हैं, उससे अवश्य मेरा हित ही होगा । पी़छे नेत्र बन्द करके ज्यों का त्यों ही सोता रहा । गुरु ने उसके कण्ठ में चीरा दिया और थोड़ा-सा रक्त निकाल कर एक पत्ते पर लेकर सर्प को पिला दिया । सर्प चला गया ।
दो-चार दिन के बाद गुरु ने शिष्य से पू़छा- जब मैं तेरे कण्ठ के चीरा लगाने लगा तब तुझे क्रोध क्यों नही आया । शिष्य- क्रोध तो अनहित करने पर आता है । मैंने तो उस समय यही सोचा था कि गुरुजी जो कु़छ कर हैं उसमें मेरा हित ही होगा । फिर गुरुजी ने सर्प के बदले की कथा भी सुनादी । यही उक्त दोहे में है ।
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द्वितीय दृष्टांत -
रज्जब देखि मुरीद को, पूछा दुख क्यों पाय ।
नहीं नाथ गुर ईश हैं, मैं ही मूरख आय ॥२५॥
आमेर नगर में एक संत के एक छोटी अवस्था का एक शिष्य था । वे उसे पढ़ाने के लिये बहुत पीटा करते थे । एक दिन रज्जबजी ने उस लडके की परीक्षा ते निमित्त कहा - भाई तेरे गुरु बिना कारण ही तुझे बहुत ताड़ना देते है और उनसे तुझे लाभ भी कु़छ नहीं हुआ है । इसलिये उनको छोडकर तू हमारे पास आजा । हम तुझको प्रेम से पढ़ायेंगे और ताड़ना भी नहीं देंगे ।
लड़के ने कहा - भगवन् ! आपका कहना तो ठीक है किन्तु गुरुजी तो ताड़ना देते हैं, वह मेरी भलाई के लिये ही देते है । गुरुजी में कु़छ भी दोष नहीं दिखता । जो कमी है वह, मेरी बुद्धि मंदता की ही है । अतः आप कृपा ही करें गुरुजी को त्यागने की बात पुनः नही कहना । लड़के की बातें सुनकर रज्जबजी अति प्रसन्न हुये और उसके शिर पर अपना वरद हस्त रखकर उसे श्रेष्ठ बुद्धि प्रदान करदी । फिर तो उसके भाग्य खुल गये ।
दोष दृष्टि गुरु में न करें, वे हों शिष्य महान ।
रज्जब ने शिर हाथ दे, बना दिया मतिमान ॥४९॥

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