卐 दादूराम~सत्यराम 卐
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*श्री वाह्यांतर वृत्ति वार्ता*
रचना ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
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द्वितीय दिन ~
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सखी एक इक आश्रय द्वारा,
उर्ध्व जाय को करो विचारा ।
समझ गई नल के बलवारी,
नहीं शिष्य गुरु आश्रय प्यारी ॥१४॥
आं. वृ. - ‘‘एक का सहारा लेकर एक ऊँचा जाता है। तू विचार करके बता वह कौन है ?’’
वा. वृ. - ‘‘नल के सहारे जल ऊँचा जाता है।’’
आं. वृ. - ‘‘नहीं सखि! गुरु ज्ञान का सहारा लेकर शिष्य ब्राह्मी स्थिति को प्राप्त होता है। तूँ भी गुरु से प्राप्त बोध को धारण करने से ब्रह्म भाव को प्राप्त हो जायेगी।’’
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वा. वृ. - सखी तुम्हारी बात तो, निश्चय परम अमूल्य ।
किन्तु होत नहिं धारणा, हिय में सुनने तुल्य ॥१५॥
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आं. वृ. - तू तो नाना वासना, हिय में भर कर आय ।
आशा पूरित स्रदय में, ज्ञान नहीं ठहराय ॥१६॥
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वा. वृ. - सत्य कहत हो सहेली, इसमें मिथ्या नांहि ।
भरी पड़ी बहु कल्पना, मेरे मन के मांहि ॥१७॥
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अब तो मन अकुलात है, ठहर सकत हूं नांहि ।
किन्तु तुम्हारे वचन मैं, धारूंगी मन मांहि ॥१८॥
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कवि - वन्दन कर बाहिर गई, लागी विषयों संग ।
किन्तु कुछक सत्संग का, लगा स्रदय में रंग ॥१९॥
इस कारण ही निविद्ध से, होकर के उपराम ।
करने लागी प्रेम से, शास्त्र विहित सब काम ॥२०॥
किन्तु दिव्य सुख के लिये, चहत रही सुरधाम ।
थक कर फिर करने लगी, सुषुप्ति में विश्राम ॥२१॥
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श्री वाह्यांतर वृत्ति वार्ता में द्वितीय दिन वार्ता समाप्त
(क्रमशः)

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