सोमवार, 21 अक्टूबर 2013

श्री वाह्यांतर वृत्ति वार्ता(द्वि.दि.- १४/२१)

卐 दादूराम~सत्यराम 卐

.
*श्री वाह्यांतर वृत्ति वार्ता*
रचना ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥ 
द्वितीय दिन ~ 
सखी एक इक आश्रय द्वारा, 
उर्ध्व जाय को करो विचारा । 
समझ गई नल के बलवारी, 
नहीं शिष्य गुरु आश्रय प्यारी ॥१४॥ 
आं. वृ. - ‘‘एक का सहारा लेकर एक ऊँचा जाता है। तू विचार करके बता वह कौन है ?’’ 
वा. वृ. - ‘‘नल के सहारे जल ऊँचा जाता है।’’ 
आं. वृ. - ‘‘नहीं सखि! गुरु ज्ञान का सहारा लेकर शिष्य ब्राह्मी स्थिति को प्राप्त होता है। तूँ भी गुरु से प्राप्त बोध को धारण करने से ब्रह्म भाव को प्राप्त हो जायेगी।’’ 
.
वा. वृ. - सखी तुम्हारी बात तो, निश्‍चय परम अमूल्य । 
किन्तु होत नहिं धारणा, हिय में सुनने तुल्य ॥१५॥ 
.
आं. वृ. - तू तो नाना वासना, हिय में भर कर आय । 
आशा पूरित स्रदय में, ज्ञान नहीं ठहराय ॥१६॥ 
.
वा. वृ. - सत्य कहत हो सहेली, इसमें मिथ्या नांहि । 
भरी पड़ी बहु कल्पना, मेरे मन के मांहि ॥१७॥ 
.
अब तो मन अकुलात है, ठहर सकत हूं नांहि । 
किन्तु तुम्हारे वचन मैं, धारूंगी मन मांहि ॥१८॥ 
.
कवि - वन्दन कर बाहिर गई, लागी विषयों संग । 
किन्तु कुछक सत्संग का, लगा स्रदय में रंग ॥१९॥ 
इस कारण ही निविद्ध से, होकर के उपराम । 
करने लागी प्रेम से, शास्त्र विहित सब काम ॥२०॥ 
किन्तु दिव्य सुख के लिये, चहत रही सुरधाम । 
थक कर फिर करने लगी, सुषुप्ति में विश्राम ॥२१॥ 
.
श्री वाह्यांतर वृत्ति वार्ता में द्वितीय दिन वार्ता समाप्त
(क्रमशः)

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें