शुक्रवार, 18 अक्टूबर 2013

श्री वाह्यांतर वृत्ति वार्ता(द्वि.दि.- ८/९)

卐 दादूराम~सत्यराम 卐
.
*श्री वाह्यांतर वृत्ति वार्ता*
रचना ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥ 
द्वितीय दिन ~ 
पृथ्वी सुत इक करत अहारा, 
उसका फल दे उज्वल सारा । 
क्या समझी सखि ! गो मैं जाना, 
नहीं सहेली संत सुजाना ॥८॥ 
आं वृ. - जो भूमि से उत्पन्न् वस्तुओं को ही खाता है और उसका प्रतिफल संसार को उज्जवल तथा सार रूप देता है। यदि समझी है तो बता यह क्या है? 
वा. वृं - ‘‘यह तो गो है। घास खाकर दूध देती है।’’ 
आ. वृ. - सखि ! तू अब कुछ-कुछ समझने लगी है। देख ले सत्संग का प्रभाव उक्त पहेली का अर्थ तू ने गो ठीक ही बताया है किन्तु इससे भी अच्छा अर्थ इसका संत होगा - वे अन्नादि आहार ही करते हैं और उसका फल प्रदाताओं को संसार के सार तत्व भगवत् स्वरूप की प्राप्ति का उज्जवल उपदेश भी करते हैं। अत: गो तथा संत जनों की सेवा किया कर इससे अति लाभ होगा। 
पर संपद लख के जल जावे, 
पर विपत्ति से अति हर्षावे । 
क्या समझी ! जवास मैं जानी, 
नहिं सखि यह ईर्ष्यालु प्रानी ॥९॥ 
आं. वृ. - ‘जो अन्य की उन्नति देखकर जलता है और पतन देखकर प्रसन्न होता है। बता वह कौन है?’ 
वा. वृ. - ‘‘यह तो जवासा है। वर्षा काल में पास के घास को हरा भरा देख कर जल जाता है और ग्रीष्म काल में पास के घासादि को सूखा देखकर खूब हरा भरा बन जाता है।’’ 
आं. वृ. - ‘‘नहीं, सखि ! यह तो ईर्ष्यालु मनुष्य है। ईर्ष्यालु मनुष्यों का संग तुझे कभी भी नहीं करना चाहिये।’’ 
(क्रमशः)

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें