卐 दादूराम~सत्यराम 卐
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*श्री वाह्यांतर वृत्ति वार्ता*
रचना ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
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द्वितीय दिन ~
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जिहिं समझत सुख होत अपारा,
नहिं समझे दुख लहैं गँवारा ।
क्या समझी सखि !
हिंसक जारा, नहिं सखि ।
यह तो वेद विचार ॥१०॥
आं. वृ. - ‘‘जिसके समझने से अपार आनन्द और न समझने से अति दुख होता है। बता क्या समझी ?’’
वा. वृ. - ‘‘यह तो व्याध का जाल है। जो पशु, पक्षी और जलचर समझ जाते हैं कि यह तो हमारा नाशक है। तब उसमें नहीं घुसते और सुखी होते हैं। तथा न समझ कर घुस जाते हैं तो मृत्यु रूप अपार क्लेश पाते हैं।’’
आं. वृ. - ‘‘नहीं सखी ! यह तो वेद का विचार है। यदि वेद ज्ञान ठीक-ठीक समझ लिया जाता है तब तो मुक्ति रूप परमानन्द प्राप्त होता है और न समझने वाले अज्ञानी प्राणी बार-बार जन्म मरणादिक रूप अपार दु:ख ही पाते हैं। तुझे सत्संग द्वारा वेद ज्ञान समझने का यत्न करना चाहिये।’’
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इक इक बल से ऊंचा जावे,
फिर सजनी वह पीछा आवे ।
वायु वेग से पष सयानी,
नहिं सखि कर्म वेग से प्रानी ॥११॥
आं. वृ. - ‘‘एक, एक की शक्ति से उर्ध्व को जाता है फिर नीचे को आता है। सदा ऐसे ही भ्रमण करता रहता है। बता वह कौन और किसकी शक्ति से जाता आता है ?’’
वा. वृ. - ‘‘वायु के बल से पत्ता आता जाता है।’’
आं. वृ. - ‘‘नहीं, सखि ! कर्म के बल से जीव आता जाता है और क्लेश ही पाता है, परमानन्द को प्राप्त नहीं होता। इस कर्म क्लेश से मुक्त होने के लिये निज स्वरूप को जानने का प्रयत्न शक्ति भर अवश्य करना चाहिये।’’
( क्रमशः )

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