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*"श्री दादूवाणी प्रवचन पद्धति"*
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
*गुरुदेव का अंग १/९०-९१*
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*मन के मते सब कोइ खेले, गुरुमुख विरला कोइ ।*
*दादू मन की माने नहीं सद्गुरु का शिष सोइ ॥९०॥*
दृष्टांत - गोरख देखा जाट को, हल जीतत मग पास ।
शिष्य किया मन मारज्यो, जग से होय उदास ॥१९॥
उक्त साखी के उत्तरार्ध पर दृष्टांत है । एक किसान हल चला रहा था । उसके समीप के मार्ग से गोरक्षनाथ निकले । उन्हें देखकर वह उनके पास गया ओर प्रणाम करके बोला - आप यहां इस वृक्ष के नीचे विराजें । मेरी स्त्री भोजन लेकर आने वाली है । भोजन करके आप विश्राम करना और फिर पधार जाना । वे ठहर गये ।
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फिर जब जाने लगे तब किसान ने कहा - महाराज ! मुझे भी कल्याणप्रद उपदेश कर जावें । गोरक्षनाथ जी ने कहा - मन का कहा मत करना जगत से उदास रहना कल्याण हो जायगा । उक्त प्रकार शिष्य बना कर संत चल दिये । सायंकाल को किसान ने हल से बैल खोलकर हल अपने कंधे पर रक्खा कि गोरक्षनाथजी का उपदेश याद आ गया । संत कह गये थे कि मन का कहना नहीं करना । घर जाने को मन ही तो कहता है । घर नहीं जाऊंगा । हल नीचे उतार दूं । यह भी तो मन ही कहता है । नहीं उतारूंगा ।
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इसी प्रकार जो - जो संकल्प हुआ उसका त्याग करता गया । अन्त में संकल्प शून्य होने से वहां खड़े ही समाधि लग गई । १२ वर्ष बाद दैव योग से गोरक्षनाथ फिर उधर से निकले तो उन्हें किसान याद आ गया । फिर ध्यान द्वारा देखा तो ज्ञात हुआ कि उसकी तो यहां ही समाधि लगी हुई है । नाथजी ने उसे समाधि से जगाया । कंधे पर हल होने से हालीपाव नाम रक्खा । अब वह चौरासी सिद्धों में एक सिद्ध माने जाते हैं ।
जो मन की माने नहीं, जीत सके मन सोय ।
जीता हालीपावने, संकल्प शून्य सु होय ॥२२॥
दृष्टांत सुधा - सिन्धु तरंग ४ । जो मन की बात न माने वही सच्चा शिष्य होता है ।
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*सब जीवों को मन ठगे, मन को विरला कोइ ।*
*दादू गुरु के ज्ञान से, साई सन्मुख होइ ॥९१॥*
सन्त भतृहरि एक नगर में हलवाई की दुकान पर हलवा देखकर हलवाई से बोले - मुझे हलवा दे । हलवाई - पैसे लाओ । भर्तृहरि - पैसे तो नहीं हैं । हलवाई - तब हलवा नहीं मिलेगा । भर्तृहरि - पैसे कहां मिलेंगे ? हलवाई - ग्राम के दक्षिण की ओर एक तालाब खुद रहा है, वहां जाकर काम करो तो पैसे मिलेंगे ।
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भर्तृहरि तालाब की ओर चले और सोचने लगे आज तो मन ने बहुत हैरान किया है । इतने में हो मार्ग में गाय का एक बडा पोठा दिखाई दिया । भर्तृहरि उसे भी उठाकर साथ ले चले तालाब पर जा, घाट पर बैठकर हलवा का ग्रास मच्छियों को ओर गोबर का ग्रास अपने मुख में डालने लगे ।
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जब एक ग्रास हलवा का बचा तब मन मुर्ति धारण करके कहता है एक ग्रास तो दें किन्तु भर्तृहरि ने नहीं दिया । उक्त प्रकार जो करता है वह अवश्य मन को जीत लेता है ।

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