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*"श्री दादूवाणी प्रवचन पद्धति"*
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
*गुरुदेव का अंग १/१०६*
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*दादू मांहीं मीठा हेतकर, ऊपर कड़वा राखि ।*
*सद्गुरु शिष को सीख दे, सब साधू की साखि ॥१०६॥*
दृष्टांत- दिई कसौटी शिष्य को, गुरु निपजावन काज ।
कुंभ मेल्हि शिष चालतां, कलश कहा जा आज ॥
संत कीताजी के पास एक जिज्ञासू आया और १२ वर्ष तक उनकी सेवा करता हुआ उनके तखत के नीचे रहा । किन्तु कीताजी ने उसे उपदेश नहीं दिया । कीताजी की पत्नी ने प्रार्थना की - भगवन् ! यह जिज्ञासु १२ वर्ष से आपकी सेवा में तत्पर है, अब तो इस पर कृपा करिये । कीताजी - ठीक है । फिर दो चार दिन पश्चात् कीताजी ने जिज्ञासु तो एक घट देकर कहा - इसको अमुक कूप से भर लाओ - वह भर लाया किताजी ने पू़छा - किस कूप से लाया ? जिज्ञासु - आपने कहा था उसी से ? कीताजी ने यह कहते हुये कि - मैंने उससे लाने को तो नहीं कहा था, उसके शिर पर ही दंडा मार कर घट को फोड़ डाला और दूसरा घड़ा देकर अन्य कूप से लाने को कहा, लाने पर पूर्ववत ही उसे फोड़ डाला ।
उक्त प्रकार ही उसके शिर पर सात घड़े फोड़ डाले, शीतकाल का समय था, शरीर के वस्त्र भीगने से शरीर भी ठंड से कांप रहा था तथा कहने के अनुसार काम करके पर भी कीताजी उसे डांट रहे थे इत्यादि कारणों से विक्षेप होना स्वाभाविक ही था फिर भी सात घड़े शिर पर फोड़ने तक तो उसके मन में कीताजी के प्रति दोष दृष्टि नहीं हुई थी । आठवां घड़ा लेकर चला तब उसका शरीर शीत से भी कांप रहा था तथा भूख से भी व्याकुल हो रहा था । इससे उसने सोचा - अब तो आठवां घड़ा ले जाना मेरे लिये अति कठिन है । घड़ा मार्ग में रख कर अन्यत्र जाने लगा तब घड़े से आवाज आई - अरे ! अब तो तेरा काम बन गया, कहॉं जाता है ? अब के जाते ही तेरा भाग्य खुल जायगा ।
उक्त प्रकार ही उसके शिर पर सात घड़े फोड़ डाले, शीतकाल का समय था, शरीर के वस्त्र भीगने से शरीर भी ठंड से कांप रहा था तथा कहने के अनुसार काम करके पर भी कीताजी उसे डांट रहे थे इत्यादि कारणों से विक्षेप होना स्वाभाविक ही था फिर भी सात घड़े शिर पर फोड़ने तक तो उसके मन में कीताजी के प्रति दोष दृष्टि नहीं हुई थी । आठवां घड़ा लेकर चला तब उसका शरीर शीत से भी कांप रहा था तथा भूख से भी व्याकुल हो रहा था । इससे उसने सोचा - अब तो आठवां घड़ा ले जाना मेरे लिये अति कठिन है । घड़ा मार्ग में रख कर अन्यत्र जाने लगा तब घड़े से आवाज आई - अरे ! अब तो तेरा काम बन गया, कहॉं जाता है ? अब के जाते ही तेरा भाग्य खुल जायगा ।
सात घड़ा शिर ऊपर फोड़ा,
तोउ सुबुद्धि अंग नहिं मोड़ा ।
अष्टम घट पथ में रख भागा,
अब जा गुरु में अनुग्रह जागा ।
घट लेकर जल से भरा और कीताजी के पास गया । कीताजी ने उसके शिर से घडा उतारकर उसे अपने कंठ से लगा लिया और दिव्य ज्ञान सम्पन्न कर दिया । वह तत्काल कृतार्थ हो गया ।
गुरु कसनी जो सह सके, शीघ्र परम पद पाय ।
सप्त घडा शिर फोड कर, कीता कंठ लगाय ॥३९॥

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