मंगलवार, 22 अक्टूबर 2013

श्री वाह्यांतर वृत्ति वार्ता(तृ.दि.- १/४)

卐 दादूराम~सत्यराम 卐
.
*श्री वाह्यांतर वृत्ति वार्ता*
रचना ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥ 
तृतीय दिन ~ 
कवि - वाह्य वृत्ति दिन तीसरे, निषेध से उपराम । 
हो सत्संगति के लिये, आई आंतर धाम ॥१॥ 
.
कर प्रणाम बोली सखी, तव शिक्षा सु प्रभाव । 
पड़ा चित्त अब निषिध में, करता नहिं उत्साव ॥२॥
.
ऐसा दौड़त हाथ न आई, 
जिधर चलावे उधर न जाई । 
क्या समझी सखि ! अनपढ़ घोड़ा, 
नहिं, मन भक्ति मांहिं दे रोड़ा ॥३॥ 
आं. वृ. - ‘‘जो इतना अधिक दौड़ता है कि पकड़ने में नहीं आता और जिस ओर चलना चाहैं उधर नहीं चलता। यदि समझी है तो बता यह क्या है!’’ 
वा. वृ. - ‘‘अशिक्षित घोड़ा है।” 
आं वृ. - ‘‘नहीं, सखि ! यह तो भगवत् भक्ति में विघ्न डालने वाला मन है। तू भी सावधान रहना, कहीं मन के धोखे में नहीं आ जाना।’’ 
.
उभय सदा से आवे जावे, 
भावत एक न दूजा भावे ।
क्या समझी सखि ! है दिन राता, 
नहि सखि सुख दुख भव विख्याता ॥४॥ 
आं. वृ. - ‘‘दो अनादि काल से आते जाते हैं। एक प्रिय लगता है और दूसरा नहीं। बता वे कौन हैं?’’ 
वा. वृ. - ‘‘ये तो दिन रात हैं। दिन प्रकाशमय होने से प्रिय लगता है और रात्रि अंधकारमय होने से प्रिय नहीं लगती।’’ 
आं. वृ. ‘‘नहीं, सखि। ये तो सुख दु:ख हैं।’’ 
(क्रमशः)

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें