卐 दादूराम~सत्यराम 卐
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*श्री वाह्यांतर वृत्ति वार्ता*
रचना ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
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तृतीय दिन ~
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कवि - वाह्य वृत्ति दिन तीसरे, निषेध से उपराम ।
हो सत्संगति के लिये, आई आंतर धाम ॥१॥
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कर प्रणाम बोली सखी, तव शिक्षा सु प्रभाव ।
पड़ा चित्त अब निषिध में, करता नहिं उत्साव ॥२॥
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ऐसा दौड़त हाथ न आई,
जिधर चलावे उधर न जाई ।
क्या समझी सखि ! अनपढ़ घोड़ा,
नहिं, मन भक्ति मांहिं दे रोड़ा ॥३॥
आं. वृ. - ‘‘जो इतना अधिक दौड़ता है कि पकड़ने में नहीं आता और जिस ओर चलना चाहैं उधर नहीं चलता। यदि समझी है तो बता यह क्या है!’’
वा. वृ. - ‘‘अशिक्षित घोड़ा है।”
आं वृ. - ‘‘नहीं, सखि ! यह तो भगवत् भक्ति में विघ्न डालने वाला मन है। तू भी सावधान रहना, कहीं मन के धोखे में नहीं आ जाना।’’
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उभय सदा से आवे जावे,
भावत एक न दूजा भावे ।
क्या समझी सखि ! है दिन राता,
नहि सखि सुख दुख भव विख्याता ॥४॥
आं. वृ. - ‘‘दो अनादि काल से आते जाते हैं। एक प्रिय लगता है और दूसरा नहीं। बता वे कौन हैं?’’
वा. वृ. - ‘‘ये तो दिन रात हैं। दिन प्रकाशमय होने से प्रिय लगता है और रात्रि अंधकारमय होने से प्रिय नहीं लगती।’’
आं. वृ. ‘‘नहीं, सखि। ये तो सुख दु:ख हैं।’’
(क्रमशः)

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