सोमवार, 30 दिसंबर 2013

श्री वाह्यांतर वृत्ति वार्ता(न.दि.- १/३)


卐 दादूराम~सत्यराम 卐
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*श्री वाह्यांतर वृत्ति वार्ता*
रचना ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥ 
नवम दिन ~
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कवि -
वाह्य वृत्ति नवमें दिवस, आई आंतर पास ।
बैठी सन्मुख प्रणति कर, हिय में अति उल्लास ॥१॥
आंतर लख कर वाह्य को, कहने लगी सप्रेम ।
मन देकर सम्यक सुने, अवश्य दे जो क्षेम ॥२॥
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टूट पड़त काला पर नारी, 
काला मरे हर्ष हो भारी ।
पड़त सर्प पर बिजली प्यारी ! 
अघ पर गिरे भक्ति सुखकारी ॥३॥
आं वृ. - “काले पर एक नारी गिरती है और काला मरने से घर में भारी आनन्द होता है । बता वह कौन है ?’’ 
वां वृ. - “काले सर्प पर बिजली पड़ती है । घर का सर्प मरने से घर वाले सुखी होते ही हैं ।’’ 
आं वृ. - “यह तो अघ(पाप) पर भगवत् भक्ति पड़ती है और पाप को नष्ट कर देती है । पाप नष्ट होते ही स्रदय में आनंद होता है । तू भी सभी पापों को नष्ट करने के लिये अपने स्रदय में भगवत् भक्ति को निरंतर स्थान देना जिससे तेरा स्रदय भी परम शुद्ध होकर आनंद से भर जायगा । परमानंद की प्राप्ति के लिये भगवत् भक्ति को छोड़कर अन्य कोई उत्तम साधन नहीं है । इसीलिये संतों ने भी भक्ति को ही मुख्यता दी है ।’’ 
(क्रमशः)

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