सोमवार, 30 दिसंबर 2013

= अ. त./१-२ =

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*श्री सन्त-गुण-सागरामृत श्री दादूराम कथा अतिपावन गंगा* ~ स्वामी माधवदास जी कृत श्री दादूदयालु जी महाराज का प्राकट्य लीला चरित्र ~ संपादक-प्रकाशक : गुरुवर्य महन्त महामण्डलेश्‍वर संत स्वामी क्षमाराम जी ~
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*(“अष्टम - तरंग” १-२)*
*इन्दव - छन्द*
*जोबनेर धानक्या ५ दिन विराजे*
सम्वत चन्द ॠतु गुण सागर, 
चैत्र सुदी द्वितिया रवि थाये ।
दादु दयालु तजी तब साँभर, 
अम्बपुरी पुनि आप सिधाये ।
रामत करत चले सब शिष्य जु, 
ग्रामहु जोबनेर तब आये ।
धानकिया टीकम भये शिष्य जु, पंच दिना लगि वास कराये ॥१॥ 
विक्रम सम्वत् १६३७, चैत्र शुक्ला द्वितीया रविवार को श्री दादूजी ने साँभर स्थान को छोड़कर आमेर के लिये प्रस्थान किया । गमन करते हुये सब संत शिष्य जोबनेर ग्राम पहुंचे, वहां से धानकिया ग्राम पधारे, जहाँ टीकमदास जी स्वामीजी के शिष्य बने । धानकिया ग्राम में स्वामीजी पाँच दिन तक विराजे ॥१॥ 
*आमेर में विनाश किया कन्दरा मध्य*
संत सभी संग लेय गुरुजन, 
अम्बपुरी तब वास किये है ॥ 
ध्यान को थान भलो गिरि कंदर, 
संत सरोवर पास रिये है ॥ 
आवत लोग चहूं दिशि दरशन, 
दादु दयालु हिं भाव भये है ॥ 
ज्ञान गंभीर महा तप मूरति, 
शील सुमेर हिं संत थये है ॥२॥ 
फिर सभी संत शिष्यों को संग लेकर स्वामीजी आमेर पधारे । निवास एवं ध्यान के लिये सरोवर के समीपस्थ एक गिरि - कन्दरा को उचित स्थान माना, और वहाँ विराजे । ज्ञान गंभीर, महातपोमूर्ति, शील सुमेरु संत श्री दादूजी की आगमन वार्ता एवं शोभा सुनकर वहाँ भी दर्शनार्थी आने लगे ॥२॥ 
(क्रमशः)

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