शनिवार, 28 दिसंबर 2013

= काल का अंग २५ =(१५/१६)


॥ दादूराम सत्यराम ॥
*"श्री दादूदयाल वाणी(आत्म-दर्शन)"*
टीका ~ महामण्डलेश्वर ब्रह्मनिष्ठ पंडित श्री स्वामी भूरादास जी
साभार विद्युत संस्करण ~ गुरुवर्य महामंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमाराम जी महाराज
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*काल का अंग २५*
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*पाव पलक की सुधि नहीं, श्वास शब्द क्या होइ ।* 
*कर मुख मांहि मेलतां, दादू लखै न कोइ ॥१५॥* 
टीका ~ हे जिज्ञासुओं ! एक पग उठाते ही, पलक खोलते ही, एक श्वास लेते ही, शब्द बोलते ही, कौन जाने काल की गति को, शरीर रहे या न रहे ? ब्रह्मऋषि कहते हैं कि हाथ में रोटी का ग्रास लेकर मुख में रखते ही अर्थात् न जाने, दूसरा ग्रास ले या नहीं ले, शरीर छूट जाय ? इस काल की गति को कोई भी नहीं जानते हैं ॥१५॥ (‘पाव’ के स्थान पर ‘पग’ पाठान्तर है ।) 
*दादू काया कारवीं, देखत ही चल जाइ ।* 
*जब लग श्वास शरीर में, राम नाम ल्यौ लाइ ॥१६॥* 
टीका ~ हे जिज्ञासु ! यह स्थूल शरीर रूप काया, कुम्हार के कच्चे घड़े की तरह देखते - देखते ही विनिष्ट होती जा रही है । इसलिये जब तक शरीर में प्राण हैं, तब तक सचेत होकर राम - नाम का स्मरण करना चाहिये ॥१६॥
(क्रमशः)

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