शनिवार, 28 दिसंबर 2013

= स. त./३५-६ =

#daduji
*श्री सन्त-गुण-सागरामृत श्री दादूराम कथा अतिपावन गंगा* ~ स्वामी माधवदास जी कृत श्री दादूदयालु जी महाराज का प्राकट्य लीला चरित्र ~ संपादक-प्रकाशक : गुरुवर्य महन्त महामण्डलेश्‍वर संत स्वामी क्षमाराम जी ~
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*(“सप्तम - तरंग” ३५-६)*
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*दामोदर की पत्नी उमा लूंग काली मीरच द्वारा ४ सन्तान*
लौंग फल लेत पानि, काली मिर्च दोय पुनि,
स्वामीजी प्रसन्न होत देत द्विज नारी को ।
लौंग फल पाय करि, द्विज नारी गर्भ धरि,
‘गरीब’ ‘मसकीन’ सुत होत द्विज प्यारी को ।
तांके पीछे वर्ष एक, मिर्च फल पायो नेक,
नवें मास कन्या दोय, लेय अवतारी को ।
ऐसी कृपा करीगुरु द्विज घर सुत चांरु,
संत - परसाद पाय मोद वारापारी को ॥३५॥ 
स्वामीजी ने दो लवंग और दो काली मिर्च अपने हाथ से द्विजनारी उमा को प्रसाद स्वरूप दिये । लवंग फल स्वरूप द्विजनारी ने गर्भधारण किया, और क्रमश: गरीब तथा मसकीन नामक बालकों को जन्म दिया । फिर एक वर्ष के अन्तराल के बाद काली मिर्च के प्रसाद - प्रभाव से नौवें मास युगल कन्याओं को जन्म दिया । गुरुदेव की कृपा से द्विज दामोदर के घर सुन्दर चार सन्तानें खेलने लगी । संत - प्रसाद पाकर उसके मोद का वारापार नहीं था ॥३५॥
*इन्दव छन्द*
*विप्र दामोदर उमा के गरीबदास मसकीनदास राम श्याम बाई*
अविगत की गति कोउ न जानत, 
कौन बखान सकै गुण साँई ।
ज्यूं नट की गति कोई न जानत, 
त्यूं हरि की गति कौन लखाई ।
ज्यूं विधि तें उपजै सनकादिक, 
त्यूं वर विप्र दामोदर पाई ।
च्यारुं हि सन्तति लें अवतार जु, 
दो सुत होय, भई युग बाई ॥३६॥ 
अविगत अगोचर ईश्वर की लीला कौन जान सकता है ? उसके गुणों का व्याख्यान कौन कर सकता है ? जब साधारण नट - बाजीगर की गति लीला कोई नहीं समझ सकता, तो श्री हरि जैसे जगत् को नचानेवाले महान् नट की माया साधारण जन भला कैसे जान सकता है । जैसे ब्रह्मा की मानसिक संकल्प शक्ति से सनकादिक उत्पन्न हुये, वैसे ही दादूजी के प्रसाद(वरदान) से विप्र कन्या उमा ने चार सन्तानें प्राप्त की ॥३६॥ 
(क्रमशः)

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