卐 सत्यराम सा 卐
फूटी काया जाजरी, नव ठाहर काणी ।
तामें दादू क्यों रहै, जीव सरीषा पाणी ॥८॥
टीका ~ हे जिज्ञासुओं ! यह शरीर नौ जगह से खंडित है, अर्थात् नौ द्वार वाला है और फिर विषयों में आसक्ति से जर्जर हो रहा है । ऐसे शरीर में अन्तर्मुख - वृत्ति का क्षय होता है राम नाम के स्मरण के बिना, इसमें जल जैसा द्रवित जीव कैसे रह सकेगा, इसका विनाश अवश्यम्भावी है ॥८॥
कबीर यहु तन काचा कुम्भ था, लिये फिरै था साथ ।
ठफका लाग्या फूटगा, कछु न आया हाथ ॥
अहुंठ कोड़ इक इक उभै, इते माग मधि एक ।
‘रज्जब’ जीव जल क्यों रहै, काया कुंभ ये छेक ॥
(रज्जबजी महाराज कह रहे हैं कि अहुंठ = साढ़े तीन कोड़ = करोड़ रोम कूप छोटे मार्ग और उनके उभै यानी दुगुने = सात और एक के दुगने = दो अर्थात् कुल नौ बड़े छेक = छेद; जिस काया घड़े में होंगे, उसमें जीव रूपी जल कैसे रहेगा ?)
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बाव भरी इस खाल का, झूठा गर्व गुमान ।
दादू विनशै देखतां, तिसका क्या अभिमान ॥९॥
टीका ~ हे जिज्ञासुओं ! श्वास भरी हुई इस शऱीर रूप खाल का क्या अभिमान करते हो ? जो इसका गर्व और गुमान करते हैं अर्थात् शारीरिक बल, काले गोरे का गुमान, ये तो सब मिथ्या हैं । ये तो देखते - देखते ही नाश होते जा रहे हैं । इनका क्या अभिमान करना है ॥९॥
पेट बंध भया बादशाह, बाव सरै, देऊं राज ।
फक्कड़ छुडाया तीन बर, राज लेहु क्या काज ॥
दृष्टान्त ~ एक बादशाह का पेट बन्द हो गया अर्थात् अपान वायु बन्द हो गई । तब पेट फूल कर ढोल हो गया, अफारा नहीं उतरा । बादशाह घबराकर बोला ~ कि जो कोई मेरा अफारा उतार दे, तो उसको सम्पूर्ण राज दे दूँ । इतने में एक फक्कड़ साधु आ पहुँचा । साधु बोला ~ क्या बात है बादशाह ? बादशाह ने वृत्तान्त सुना दिया । फक्कड़ के हाथ में डंडा था । तानकर बादशाह के पेट पर एक डंडा मारा, तो बादशाह की अपान वायु निकली, ‘‘धौं धौं‘ । दूसरा डंडा मारा । फिर बोली ~ ‘‘धौं ।’’ तीसरा डंडा फिर मारा । फिर बोली ~ ‘‘धौं ।’’ बादशाह का पेट पतला हो गया और आराम आ गया । बादशाह बोला ~ यह सारा राज आपके नजर है, आपने मेरी जान बचा दी । फक्कड़ बोले ~ चल, इस तेरे राज का क्या करें ? यह तो तीन पाद की कीमत का है ।
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दादू देही देखतां, सब किसही की जाइ ।
जब लग श्वास शरीर में, गोविन्द के गुण गाइ ॥२३॥
टीका ~ हे जिज्ञासुओं ! यह स्थूल शरीर देखते - देखते सभी के जा रहे है अर्थात नष्ट हो रहे हैं । इसलिये साधक पुरुषों को चाहिये कि जब तक शरीर में श्वास स्थित है, तब तक गोविन्द का स्मरण करना चाहिये । इसी में भला है ॥२३॥
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दादू देही पाहुणी, हंस बटाऊ मांहि ।
का जाणूं कब चालसी, मोहि भरोसा नांहि ॥२४॥
टीका ~ हे जिज्ञासुओं ! यह मनुष्य देह तो अति प्रिय मेहमान की भॉंति मिला है और हंस जीव रूप प्राण, इसमें यात्री की भांति है । जैसे यात्री कभी भी उठ करके चल पड़ता है, वैसे ही यह प्राणरूप जीव, कभी भी इसका त्याग करके जा सकता है ? तत्ववेताओं को इसका विश्वास नहीं है ॥२४॥
(श्री दादू वाणी ~ काल का अंग)

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