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साभार ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
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*निष्कामी पतिव्रता का अंग ८/६३*
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*दादू - दूजे अन्तर होत है, जनि आने मन मांहि ।*
*तहँ ले मन को राखिये, जहँ कु़छ दूजा नांहि ॥६३॥*
दृष्टांत -
संत जुड़े परब्रह्म से, नृप आया दीदार ।
पूछा प्रभु क्यों एकले, अबलों द्वै बटपार ॥१८॥
एक संत ध्यान में अपने प्रभु का दर्शन कर रहे थे । उसी समय एक दर्शनार्थी राजा ने आकर उन्हें प्रणाम किया, इससे उनका ध्यान टूट गया और ध्यानस्थ भगवान् भी अन्तर्धान हो गये । राजा ने संत से पू़छा - अकेले ही कैसे बैठै थे कोई शिष्य आदि नहीं है क्या ? संत ने कहा - अब तक तो दो थे किन्तु आपके आते ही अकेले हो गये । आपने हमारे साथ वटपार(मार) का सा काम किया है । जैसे मार्ग में लूटने वाला पथिक का धन लूट लेता है, वैसे ही आपके आते ही हमारे हृदयधन प्रभु अन्तर्धान हो गये । इससे अकेले हो गये । यही उक्त ६३ की साखी में कहा है "दूजे अन्तर होत है" ।
(क्रमशः)

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